सुनो! द्रोण सुनो!
एकलव्य के दर्द में सनसनाते हुए घाव को
महसूसता हूँ
एक बारगी दर्द हरियाया है
स्नेह नहीं, गुरू ही याद आया है
जिसे मैंने हृदय में स्थान दिया
हाय! अलगनी पर टंगे हैं मेरे तरकश और बाण
तुम्हीं बताओ कितना किया मैंने तुम्हारा सम्मान!
लेकिन! एक बात दुनिया को बताऊंगा
तुम्हीं ने छलकर
दान में मांगा अंगूठा
यह विघ्न नहीं लाऊंगा
सच कहता हूँ
मेरी भुजाएं फड़कती रहती हैं
जब किसी शूर-शूरमा को देखता हूँ,
मैं अछूत नहीं हूँ
नहीं हूँ
नहीं हो सकता जानता हूँ

तुम्हीं ने बताया था गुरू
तुमने घाव दिए, दर्द दिया
फिर भी मैंने शाप नहीं, वरदान माना
हे गुरु!
तुम्हारी परम्पराएं अब बहुत दिन तक नहीं चलेंगी
क्योंकि अब एकलव्य कोई नहीं बनेगा
मैं अगाह कर दिया करता हूँ
बनना ही है तो द्रोणाचार्य जैसे गुरु का शिष्य
कोई क्यों बने?
बनना ही है तो डॉ. आंबेडकर का शिष्य बनो
बाईस घंटे उन जैसा पढ़ो
गढ़ो संविधान और कानून।

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