दुःख

‘Dukh’, a poem by Amar Dalpura

नदियों का अपना दुःख है
औरतों का अपना,
वे कल-कल बहती हैं
कल-कल में सूखती हैं

उसे कल का संगीत
और कल का समय
अन्तःप्रवाही बना देगा

आत्मा में दुःख का बहना
नदियाँ जानती हैं
औरतें जानती हैं

इसलिए सारी नदियाँ स्त्रीलिंग होती हैं
चंबल, बनास, सुकडी, कान्तली,
गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी

वह सागर से मिलने की इच्छा में,
बहती, भागती और गाती हैं,
प्रशांत-हिन्द से आलिंगन-चुम्बन करके
वे लहरों की तरह मौन हो जाती हैं

औरत का दुःख भी,
कल-कल में, पल-पल में,
नदी की तरह बहता है…