मुर्दों की भी एक वसीयत होती है
दुनिया में हर चीज की कीमत होती है।

इंसान तो क्या भगवान खरीदे जाते हैं
तभी तो सबसे ऊपर दौलत होती है ।

पेट की खातिर जिस्म का सौदा करती है
बिकने वाली की भी इज़्जत होती है ।

सच में थोड़ा झूठ मिला ही रहता है
झूठ की भी पर एक हकीकत होती है।

शक्ल-ओ-सूरत पर ही जान लुटाते हैं
दिल में झांक कर कहां मुहब्बत होती है।

घर को छोड़कर मंदिर मस्जिद करते हैं
सुना था मां के पैर में जन्नत होती है ।

मरे जो दुनिया फिक्र क्या करते हो ‘उन्मुक्त’
मरना तो इंसान की फितरत होती है।

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दीपक सिंह चौहान 'उन्मुक्त'
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसम्प्रेषण में स्नातकोत्तर के बाद मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत.हिंदी साहित्य में बचपन से ही रूचि रही परंतु लिखना बीएचयू में आने के बाद से ही शुरू किया ।

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