दुर्दशा

‘Durdasha’, a poem by Anikesh Srivastav

कल की रात
भूखे पेट
सोयी थी चाँदनी,

सुबह
सड़क के किनारे
चीथड़े में
नज़र आया सूरज,

अख़बार ने छापी
अँधेरे की चमकती तस्वीर,

कण्ठ
जब ख़ामोश होते हैं,
देश का गला घुटता है,

क़लम
जब चीख़ती नहीं है,
लोहे के हो जाते हैं
हुक्मरानों के कान के पर्दे,

वो हक़
जिनका इस्तेमाल नहीं किया जाता,
उन पर जंग लग जाती है,
वो ख़त्म हो जाते हैं,

चाँद का दायित्व है
पेट भर रौशनी बरसाने का,

सूर्य का दायित्व है
धूप का ओवरकोट
देश को पहनाने का,

सुबह के अख़बार को
अँधेरे से बचाने का,

कण्ठ ख़ामोश है,
क़लम चुप,
हक़ गुमनाम

और चाँदनी भूखे पेट है,

सूरज…!
कम से कम

तुम तो चीथड़े में न होते।

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