तपने के बाद वे भट्टे की समाधि से निकलीं
और एक वास्तुविद के स्वप्न में
विलीन हो गईं

घर एक ईंटों भरी अवधारणा है
जी बिलकुल ठीक सुना आपने
मकान नहीं, घर

जैसे घर में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता
सभी लोग करते हैं सब तरह के काम
एकदम ईंटों की तरह
जो होती हैं एक दूसरे की पयार्यवाची
एक-दूसरे की बिलकुल जुड़वाँ

वैसे ईंटें मेरे पाठयक्रम में थीं
लेकिन जब वे घर बनाने आयीं
तो पाठयक्रम से बाहर था उनका हर दृश्य
ईटों के चट्टे की छाया में
तीन ईंटें थीं एक मज़दूरनी का चूल्हा
दो उसके बच्चे की खुड्डी बनी थीं
एक उसके थके हुए सिर के नीचे लगी थी
बाद में जो लगने से बच गई
उसको तो करने थे और बड़े काम
बक्सों-अलमारियों को सीलन से बचाना था
टूटे हुए पायों को थामना था
ऊँची जगहों तक पहुँचने के लिए
बच्चों का क़द ईंटों को ही बढ़ाना था

हम चाहते हैं ईंटें हों सुडौल
सतह समतल हो
धार कोर पैनी
नाप और वज़न में खरी और पूरी तरह पकी हुई
रंगत हो सुर्ख़
बोली में धातुओं की खनक
ऐसी कि सात ईंटें चुन लें तो जल-तरंग बजने लगे

फिर दाम भी हो मुनासिब
इतना सब हो अगर, तब क्या ईंटों का भी बनता है
कुछ हक़
कि वे हमसे कुछ चाहें

याद आयी वह दीवार
जिसके साये तले रहते थे मीर
वह जिसके पीछे से गोलियाँ चलायी थीं अशफ़ाक़ ने
वही जिस पर बब्बू और रानी ने किया अपने प्रेम का इज़हार
और वह जला हुआ खण्डहर
जो अब सिर्फ़ बारिश का करता है इंतज़ार

ईंटें भला क्या चाह सकती हैं?
ईंटें शायद चाहें कि वे बनाएँ जो घर—
उसे जाना जाए थोड़े से प्रेम, थोड़े से त्याग और
थोड़े से साहस के लिए
ईंटें अगर सचमुच यह चाहें?
उस दिन से ईटों से आँख मिला पाना
मेरे लिए सहज नहीं रह गया

दोस्तो, ऐसा लगे
कि कविता से बाहर नहीं ऐसा सम्भव
तो एक बात पूछता हूँ—
अगर लखनऊ की ईंटें बनी हैं
लखनऊ की मिट्टी से
तो लखनऊ के लोग क्या किसी और मिट्टी के बने हैं!

नरेश सक्सेना की कविता 'पानी क्या कर रहा है'

Book by Naresh Saxena:

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नरेश सक्सेना
जन्म : 16 जनवरी 1939, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) कविता संग्रह : समुद्र पर हो रही है बारिश, सुनो चारुशीला नाटक : आदमी का आ पटकथा लेखन : हर क्षण विदा है, दसवीं दौड़, जौनसार बावर, रसखान, एक हती मनू (बुंदेली) फिल्म निर्देशन : संबंध, जल से ज्योति, समाधान, नन्हें कदम (सभी लघु फिल्में) सम्मान: पहल सम्मान, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (1992), हिंदी साहित्य सम्मेलन का सम्मान, शमशेर सम्मान