‘Ek Adna Sa Prem’, a poem by Abha Mishra

तुम मुझे मनुष्य की तरह प्रेम करना
किसी प्रेमी की तरह नहीं,
मैं नहीं चाहती
अपने उन्मुक्त प्रेम को
किसी प्रचलित परिभाषा में
बाँध देना।
मैं नहीं चाहती कि मेरे प्रेम को
भी दुनिया उसी चश्मे से देखे
जो पूर्वाग्रह से ग्रसित हो।
मैं प्रेम में क़ैद नहीं
आज़ाद होना चाहती हूँ,
मैं चाहती हूँ कि तुम
प्रेम करो
और मुझे ख़बर तक न हो।
ऐसा प्रेम जिसमें प्रश्न ही न हो
प्रस्ताव का!
ऐसा प्रेम जिसमें
आसमाँ की ऊँचाइयाँ
तुम छुओ और
ज़मीन पर पाँव मेरे न पड़ें,
ऐसा प्रेम जिसे
तुम उतना ही
औरों पर भी उड़ेल सको
जितना मुझपर।
मैं नहीं चाहती कि
तुम भी हो जाओ प्रेमान्ध
एक अदना-सा प्रेमी बनकर!

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