एक दूसरा घाव

शशिप्रभा शास्त्री की हिन्दी कहानी ‘एक दूसरा घाव’ | ‘Ek Doosra Ghaav’, a story by Shashiprabha Shastri

दोनों लड़कियाँ अचानक बस से उतर पड़ीं, तो देखकर चकित हो गयीं कि उन्हें तो काफ़ी आगे चलकर उतरना था। अब क्या होगा? आंधी, पानी और तूफ़ान में स्तब्ध दुःखी और किंकर्तव्यविमूढ़ वे खड़ी की खड़ी रह गयीं सन्न। मॉरिस नगर से चली थीं तो जल्दी से जल्दी पहुंच जाने की कल्पना की थी – एक स्टॉप आता, बस लदाबद भर जाती, यात्री दबादब चढ़ते-उतरते, तो लगता हे भगवान् हर बस स्टॉप पर कितनी-कितनी देर हुई चली जा रही है, जबकि बस अपने निश्चित समय तक ही ठहर रही थी और निश्चित समय पर ही चल रही थी – अब यह बीचोबीच अचानक क्या हुआ? जल्दी पहुंच जाने की तालाबेली में वे ग़लत जगह ही उतर पड़ी थीं – बीच में इतने सारे स्टॉप आये थे, कि भीड़-भड़क्का, उतारा-चढ़ी में कुछ पता ही नहीं चला, कि अभी बस कैम्प तक ही पहुंची है जबकि उन्हें मॉडल टाउन से भी आगे उतरना था, उसे ही दोनों ने अपना निश्चित स्टॉप समझा था।

कैम्प का चौराहा- दायें मोड़ पर हलवाई की दुकान पर कुछ चमक-दमक थी, किन्तु पास वाली साइकिल वाले की दुकान के साइनबोर्ड के मात्र मोटे-मोटे अक्षर ही हलवाई की दुकान के प्रकाश में उजागर हो रहे थे। चौराहे से पूर्व वाली सड़क भी ख़ाली और सुनसान होती चली जा रही थी। यों तो दिल्ली जैसी महानगरी की सड़कें दिन-रात के आठों पहर में कभी भी ख़ाली नहीं कही जा सकतीं, पर दूर-दूर तक फैली दिल्ली किन्हीं इलाक़ों में सर्दियों की रात में जल्दी ही सन्नाटे में डूब ही जाती है। माहौल कुछ-कुछ भयावह होता चला जा रहा था। दोनों लड़कियाँ समझ नहीं पा रही थीं, “अब क्या कहें? चलो, अब स्कूटर ले लेते हैं!” एक लड़की ने दूसरी से कहा।

“देखो, क्या सोचकर चले थे, कि साठ-साठ पैसों में ही काम चल जायेगा। यहां न जाने कितने की चपत पड़ जायेगी, बस तो अभी तक हमें अपनी जगह ले जाकर उतार भी देती।”

“अब क्या किया जाये। दूसरी बस का इंतज़ार करने का अब मन नहीं है, बिल्कुल गयी रात किसी के घर पहुंचना ठीक भी नहीं लगता।” पहली ने फिर
सुझाव दिया।

“अब कुछ तो करना ही पड़ेगा। स्कूटर रिक्शे भी यों निकले चले जा रहे हैं, जैसे अब उन्हें सवारी लेने की परवाह ही न हो।”

“रात जो हो गयी है ज़्यादा, सो अब अपने-अपने घरों को झपाटे से चले जा रहे हैं।”

“क्या बजा होगा?”

दूसरी ने घड़ी के डायल को उजेले में करके पढ़ा- “पौने नौ! जाड़ों की रात के पौने नौ! ओह कहां फंस गये!”

“चलो चलते हैं, शायद रास्ते में ही कोई स्कूटर रिक्शा मिल जाये।”

दोनों ने अपनी चाल तेज़ की। स्कूटर रिक्शा सड़क के बायें कोने पर ही मिल गया।

“कहां जायेंगी?”

“मॉडल टाउन के थोड़ा आगे, मॉडल टाउन ही समझ लो।”

“बैठिए, मैं इधर की ही सवारी चाहता हूँ, इधर ही मेरा घर है। बैठिए! आपको सही-सही जगह पर उतार दूँगा, आइए।”

दोनों लड़कियाँ ख़ुशी-ख़ुशी बैठ गयीं। स्कूटर वाले ने खट्ट से मीटर को सही बैठाया, पैसों के ख़ाने में अस्सी पैसे खिंच आये, लड़कियों की आंखें पढ़ने लगीं पर स्कूटर रिक्शे के रवाना होते ही मीटर अंधेरे में डूब गया। स्कूटर रिक्शे की आवाज़ ऊपर उठ आयी, पहले एक विचित्र भड़भड़ का शब्द फिर खड़र-खड़र भड़र शुः शुः। ठण्डी हवा के भारी-भारी झोंके।

‘अपनी अक़्ल और बेताबी से ही मुसीबत मोल ले ली’ – एक लड़की मन ही मन बुदबुदायी। दूसरी लड़की ने अपनी चुन्नी सिर पर कसकर लपेट ली थी।

तभी अचानक स्कूटर वाले की तरफ़ से आवाज़ आनी शुरू हो गयी— “मैं तो मार ही डाला गया था, बस बच गया किसी तरह यों कहिए।”

“क्यों क्या हुआ?” लड़कियों को उत्सुकता हुई।

“अजी वह साला उल्लू का पट्ठा बदमाश, मेरे स्कूटर में आकर बैठ गया, उसी ने ख़ून खच्चर कर दिया मेरा। आजकल तो सवारी का भी ऐतबार नहीं किया जा सकता, न जाने कैसे-कैसे बेईमान बदज़ात लोग आकर बैठ जाते हैं।”

“अच्छा! कौन था वह?”

“होगा कोई उचक्का बदमाश, हमसे बोला, हमें रिज की तरफ़ से चलना है, हम कुछ समझे कुछ नहीं समझे, हमने गाड़ी रिज की तरफ़ मोड़ ली। गाड़ी मोड़ते ही वह साला तो हम पे छुरा लेकर टूट पड़ा, निकाल जो कुछ मालमत्ता तेरे पास है। माल-मत्ते की ऐसी की तैसी साड़े भडुये के, हमारे पास तो हमारी पसीने की कमाई है हैवान!” स्कूटर वाला इस तरह उत्तर-प्रत्युत्तर करने लगा जैसे मुजरिम उसके सामने ही खड़ा हो।

“तुम्हें सवारी देखकर बैठानी चाहिए, ख़ासकर रात में।” लड़कियों की हमदर्दी उमड़ी।

“हमने तो कह दिया साले से, कि तुम गांडू के जाओ जहन्नुम में हम तो देख लेगा। उसका छुरा इतना चमचमा रहा था।” स्कूटर वाले के स्वर में रुदन भर आया था।

“सुनो भई।” लड़कियों ने कुछ कहना चाहा, पर स्कूटर की आवाज़ और तेज़ हो गयी थी, लगता था, स्कूटर हवा से बातें कर रहा है, बीच में कभी-कभी उसके अटकने, लड़खड़ाने जैसा भी आभास होता। लड़कियों ने पहले कुछ अन्दाज़ नहीं लगाया था, पर तुरन्त ही उन्हें लगने लगा, कि स्कूटर वाला उनकी बात सुन ही नहीं रहा है, सिर्फ़ अपनी कहे चला जा रहा है, रोते-बिल्लाते स्वर में वह कुछ-कुछ बके चले जा रहा है।

“देखिए, यह हाथ, साले ने इसमें ही छुरा घोंप दिया।” उसने अचानक हाथ फैला दिया- अंधेरे में भी हथेली और उंगलियों से ख़ून झिरता दिखायी दिया, तो लड़कियाँ काँप गयीं, एक ने दूसरी को कोंचा- “तू ज़्यादा मत बोल, लगता है अकस्मात् ख़राब आदमी के पल्ले पड़ जाने से इस स्कूटर वाले का दिमाग़ फिर गया है।”

“अरे! यह बात तो मन में आयी ही नहीं थी।”

इस बीच तो लड़कियाँ, स्कूटर वाले की बात के प्रत्युत्तर में कुछ कहना चाह रही थीं। कहकर उसे सांत्वना देने की कोशिश कर रही थीं, पर स्कूटर वाले की गतिविधि और बदहवासी पर ध्यान गया, तो अचानक वे दहशत से भर उठीं।

“क्या करें? हादसे ने इसका दिमाग़ ख़राब कर दिया है।” दोनों के मन के भीतर एक साथ ही फिर जगा।

“अब हमें इसके जवाब में कुछ नहीं कहना चाहिए, कहने दो इसे जो कहता है।” एक लड़की ने दूसरी को समझाया।

स्कूटर वाला कह रहा था- “हम साले को अपनी दिनभर की कमाई दे देते। आया चलकर बड़ा बेट्टी का। हमार कमाई क्या हराम की थी, क्यों दे देते! हमने नहीं दी।”

“तुमने क्या किया?” स्कूटर रिक्शे की खड़र-खड़र भड़र-भड़र आवाज़ में भी एक ने उत्सुकतावश पूछ ही लिया।

“वह तो हमने स्कूटर रोक लिया, नहीं तो साला चलते स्कूटर में छुरा घोंपता। स्कूटर के रोकने पर घोंपा साले ने और भग लिया। भीड़ तो बाद में जमा हुई। तब क्या होता।” स्कूटर वाला जितनी तेज़ी से स्कूटर दौड़ा रहा था, उतनी ही तेज़ी से बके जा रहा था। “हमने साले को छोड़ दिया, नहीं तो वह पटखनी खिलाता, कि उसे माँ का दूध याद आ जाता। कितनी मुश्किल से हम लोग कमाते हैं और ये साले हमारा सब कुछ लूटपाटकर भाग जाना चाहते हैं। क्या करें इस साले पेट के वास्ते स्कूटर रिक्शा चलाना पड़ता है। इस अनएम्प्लोयमेण्ट ने मार डाला हम ग़रीबों को तो। अपनी जान हथेली पर रखकर काम करना पड़ता है। बीवी कहती है, इस धन्धे को छोड़ दो, पर छोड़ कैसे दूँ। उस साली ने तो कह दिया, पर मैं कैसे मान लूँ, तीन-तीन बच्चे जान को रो रहे हैं। आज अपनी बीवी से जाकर क्या कहूँगा। उस बदमाश ने दस-पांच तो मार ही लिये होंगे। उल्लू तेरी दुम में नमदा – कितना तेज़ दर्द हुआ था, अगर छुरा पसलियों में भोंक देता तो मेरे बीवी-बच्चे घर में मेरा इंतज़ार करते रह जाते। उन्हें पता भी न चलता और मैं यहां किसी नाले में उलटे मुँह पड़ा होता। स्कूटर का मालिक मेरी बीवी पर मुकद्दमा चला देता, वह बेचारी कहां-कहां मारी-फिरती। हाय!!”

स्कूटर वाला तेज़ चलती हवा के झन्नाटे के साथ-साथ ही भांय-भांय रोने लगा था। स्कूटर क्षणभर को डगमगाया और फिर वह सीधी लीक पर चलने लगा। खच्च से एक बड़ा ट्रक पास से गुज़र गया तो स्कूटर फिर डगमगाया, दोनों लड़कियों को लगा, अपने आवेश-आवेश में स्कूटर वाला स्कूटर सम्भाल नहीं पा रहा है।

“सुनो, इतना घबड़ाने की ज़रूरत नहीं है सिर्फ़ : थोड़ा सचेत रहना चाहिए तुम्हें।” लड़कियों में से एक ने सब कुछ भूल फिर समझाने का उपक्रम किया।

“यह साली पुलिस भी इन बदमाशों के साथ ही मिली रहती है। क्या तो रपट करवायें इस मुलक में और किससे क्या कहें।” लड़की की बात शायद हवा में ही खो गयी थी भड़र-भड़र ठक्क-ठक्कऽऽक्कऽऽ आवाजें बनती रहीं। स्कूटर वाले की आवाज इतनी मोथरी, कर्कश और बुलन्द थी कि स्कूटर के शोर-शराबे में भी उभरकर साफ़ सुनायी पड़ रही थी। लड़कियों की सहमी-सहमी, चिचियाती आवाज़ को शायद स्कूटर वाले के कान सुन नहीं पा रहे थे, वह अपनी ही
कहे जा रहा था। – “पुलिस को भरो, गुण्डों को भरो, तो अपने बीवी-बच्चों के पेटों के घड़े कहां से भरो? घड़ा शब्द कुछ ज़्यादा ही गहरा हो गया था।

लड़कियाँ स्कूटर वाले की दशा के प्रति द्रवित होती चली जा रही थीं, उन्होंने आंखें गड़ाकर मीटर पढ़ने की कोशिश की, पर अंधेरे की बढ़ती बाढ़ ने आंखों की रोशनी को ढांप लिया- बिन्दु-बिन्दु बन लैम्पपोस्ट पीछे छूटते चले रहे थे।

“हे रब्ब, कैसा कटखना कुत्ता था, माड्डाला मुझे तो उस बांगडू ने।”

लड़कियों को इस बार स्कूटर वाले का स्वर बदला-बदला-सा दिखा कुछ बदहवासी के जैसा, एक ने दूसरी को कोहनी से धकाया।

“लगता है इस स्कूटर वाले का दिमाग़ सचमुच फिर गया है। कहीं इसने पी तो नहीं रखी?” एकाएकी एक-दूसरे ख़याल के उभरते ही दोनों भीतर तक कांप गयीं।

“यहीं उतर जाओ।” एक ने दूसरी को इशारा किया, “कहीं यह स्कूटर उड़ाता ही लिये चला जाये। अगर इस वक़्त हमारे कहने पर यह स्कूटर रोक लेता है, तो समझो, कि हमने कोई बड़े पुण्य किये होंगे।” दोनों लड़कियों ने शायद एक साथ ही सोचा।

“सुनो, स्कूटर वाले, स्कूटर रोक दो, हमें यहीं उतरना है।”

स्कूटर रिक्शा धड़ से रुक गया। दोनों लड़कियों को लगा, आज वे एक बड़ी मुहिम से बाहर निकल आयी हैं।

सड़क के एक किनारे होकर वे तेज़-तेज़ चलने लगीं।

“ज़रूर इस आदमी ने कुछ पी रखी है, या हो सकता है, उस आकस्मिक दुर्घटना से ही उसे इतनी चोट पहुंची है, कि उसका दिमाग़ यों ही फेल हो गया है। स्कूटर रिक्शे को उलटा-सीधा किसी पर चढ़ा देता, या मीलों दूर भगाये लिये चलता, तो इसकी धड़र-धड़र आवाज़ और रात के सन्नाटे में सुनने-समझने वाला भी कोई नहीं था। हमें चाहिए, कि कभी स्कूटर रिक्शे में बैठने की कोशिश न करें, बस का सफ़र इससे लाख दर्जे अच्छा होता है, उसमें इस तरह से अनसेफ़ हो जाने का तो कोई ख़तरा नहीं रहता कम-से-कम।”

“और क्या?!”

लड़कियों की चाल तेज़ होती चली जा रही थी। रचना सिनेमा के सामने से होती हुई वे सड़क के दूसरी ओर को मुड़ गयीं, जहाँ से होकर उन्हें अपने गन्तव्य पर पहुँचना था। कुछ रोशनियां दिखीं तो उनका जान में जान आयी।

“ख़ूब बचे आज।” दोनों में से एक ने फिर कहा।

तभी एक स्कूटर रिक्शा धड़धड़ाता हुआ पास से होकर निकलने लगा, तो लड़कियाँ पीछे हट गयीं।

“अरे यह तो वही स्कूटर वाला है, हमारे पीछे-पीछे ही चला आ रहा है। आख़िर क्यों?” दोनों को फिर डर लगा, तभी स्कूटर रिक्शा पास आकर रुक गया- खड़र खट्ट।

“अरे आप लोग पैदल-पैदल जा रही हैं, इसी रास्ते से तो मुझे जाना था, आप इतनी जल्दी क्यों उतर गयीं, आप शायद डर रही हैं।”

“नहीं नहीं, हमें कुछ मिठाई ख़रीदनी थी इसीलिए।”

“हाँ हाँ!” दोनों ने उंगली से सामने वाली मिठाई की दुकान की ओर संकेत किया, फिर न जाने दोनों में से एक को क्या सूझा, पीछे मुड़कर स्कूटर वाले के बहुत क़रीब होकर वह उसे फिर समझाने लगी- “सुनो भाई, तुम इतने दुःखी मत हो। जो होना था यह तो हो गया। धीरज रखो, ऐसे कैसे काम चलेगा।”

इसी तरह के वह कुछ और वाक्य बताना चाहती थी, पर स्कूटर वाले ने इंजन बंद नहीं किया था, इसीलिए उस आवाज़ में शब्द खोते चले जा रहे थे, बिना कुछ सुने वह चीख़कर बोला- “होते हैं, स्कूटर वाले बुरे भी होते हैं। मैं कहता हूँ, फ़िफ़्टी पर्सेण्ट लुच्चे-लफ़ंगे होते हैं, लड़कियों को इधर-उधर उठाकर ले जाते हैं। साले ऐसे ही लोगों ने स्कूटर वालों को बदनाम किया है, मैं तो बड़ी मुसीबत में इस पेशे में आया, सिर्फ़ अनएम्प्लोयमेंट के कारण। दसवीं तक पढ़ा है। जगह-जगह मारा फिरा, कहीं नौकरी नहीं मिली, तो किसी से टूटा-फूटा रिक्शा किराये पर लिया, ख़ुद उसकी मरम्मत की और चालू किया। आगे कौन पढ़ाता, माँ-बाप तो थे नहीं और पैसे भी नहीं थे। बीवी को आज मैं कुछ नहीं बताऊंगा, वह अहमक फिर मुझे स्कूटर छोड़ने को कहेगी। कह दूँगा हल्की-सी टक्कर लग गयी है। घाव पर मैंने यूरिनल कर लिया है, मेरा अपना यूरिनल!”

यूरीन को यूरिनल कहे जाने पर भी लड़कियों को हँसी नहीं आयी, माहौल काफ़ी विकट होता चला जा रहा था, इसीलिए। उसने ख़ून में सनी अपनी हथेली फिर दिखलायी तो लड़कियाँ घिनघिना उठीं- “आए एम अ गुड मेन, नॉन बेड मेन।” स्कूटर वाले ने ज़ुबान को ग़लत तरीक़े से तोड़ा-मरोड़ा।

एक लड़की ने दूसरी का हाथ खींचा, “चल आ जा, भाग चलें, क्या पागलपन कर रही है।”

स्कूटर वाले की आँखें उस अंधेरे में भी काफ़ी ख़ूँख़ार दिख रही थीं। लड़कियाँ सचमुच सामने दिखती मिठाई वाले की दुकान की तरफ़ भाग चलीं।

स्कूटर वाला कुछ देर स्कूटर रोके खड़ा देखता रहा। इस बीच उसने इंजन बंद कर दिया था। इंजन उसने फिर स्टार्ट किया और इस बार पहले से ज़्यादा तेजी से दौड़ने लगा।

***

स्कूटर रिक्शे को घर के सामने ले जाकर उसने एक बड़े धमाके के साथ जाकर रोक दिया। आवाज़ के साथ ही घर का दरवाज़ा रोज़ की तरह खुल गया, शायद उसकी बीवी रोज़ की तरह ही बाहर निकली खड़ी थी- एक जर्जर युवती असमय में ही पक उठे बाल, धंसी आँखें, “रोटी तैयार है?” वह सूनने की आशा कर रही थी, पर वह उस पर एकाएक बुरी तरह टूट पड़ा और भीतर ले जाकर उसे जहां-तहां से बकोटने लगा।

“क्या हो गया है तुझे आज? पागल हो गया है कुछ?” औरत चीख़ रही थी अकबकाकर और वह उसे ताबड़तोड़ पीटे चला जा रहा था। थोड़ी देर बाद वह ख़ुद ही पस्त होकर गिर पड़ा, औरत जो अब तक चीख़े-चिल्लाये जा रही थी, एकदम सन्नाटे में आ गयी।

“लो बोलो, मार-पीट ख़ुद मचायी और अब खुद ही पस्त होकर पड़ा है, क्या हुआ तुझे?”

“इतनी बुरी तरह नोचा-खसोटा है तूने साली, देख ज़रा, कैसा लोहू-लुहान कर डाला है तूने मुझे! देख!”

उसने अपनी हथेली उसके सामने कर दी, देखते ही स्त्री बुरी तरह चीख़ी- “हाय!! मैं मरी!”

“अरी क्यों चीख़ रही है, इससे भी गहरा घाव तूने मेरे सीने के भीतर कर डाला है बदजात!”

वह बदहवास-सा बके चले जा रहा था, ज़ोर-ज़ोर से उसकी स्त्री फटी-फटी आँखों से उसे तक रही थी- एक अनबूझ-सी पागलपन से भरी नज़र लिये हुए।

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Book by Shashiprabha Shastri: