एक ही दृश्य में खोए हुए दो लोग
कुछ पल के लिए अदृश्य हो जाना चाहते थे
दुनिया के लिए
उस अकेले दृश्य में
बींध दिए जाने के स्वप्न थे
(एक दूसरे को प्रणय-शर से)

दोनों बिंध जाने के कष्ट से नहीं थे भयभीत
उनको आशंका थी
दुनिया उनकी हँसी सुन लेगी
उनका सामूहिक दर्द
किसी सूचना-प्रसाद की तरह बाँट दिया जाएगा

एक ने आश्वस्ति दी
कि दुनिया के कान नहीं होते, केवल मुँह होता है
दोनों ही अक्रूर थे
फिर भी दोनों दुनिया का मुँह बींधने की योजना बनाने लगे
दृश्य में इस योजना का हिंस्र दृश्य भी जुड़ गया
दोनों विस्मित थे
दोनों भयभीत थे
दोनों एक-दूसरे को आत्मा के जल में रख लेना चाहते थे
दोनों स्वयं को छलका देना चाहते थे
दोनों चाहते थे पात्र छोटा और द्रव अधिकता में रहे
दोनों खुली आँख से बन्द पलक तक
इस दृश्य में एकमेव हो जाना चाहते थे
दोनों जानते थे
असुन्दर में कौन-सा समास है।

राहुल बोयल की कविता 'अंतर्विरोधों का हल'

Book by Rahul Boyal: