एक किरण

माँ बनने से पहले
कई बार माँ बनी थी
तब,
जब उम्मीद जगी थी
तब भी जब बच्चा गुज़रा था
तब,
जब बाज़ार में टंगे छोटे कपड़ों को देख
शरमाया था मन
और
तब भी जब फेर लिया था मुँह देख उन्हें
या तब,
जब किसी का बच्चा गोदी आने को तरसा था
देखे थे जब हाथी घोड़े से खिलौने
माँ तब भी थी
जब कचरे के ढेर के पास कान छोड़ आई थी
तब भी
जब अस्पताल साल-दर-साल साथ चला था
और
नव-वधु ने अपना पेट छुपाया था
तब,
जब बरसों से ज़हन में पलते ख़्वाब ने हाँ कहा था
और
आज सफ़ेद हरी उमस भरी चादरों के बीच
बदन को खिंचता-सा महसूस कर रही हूँ
एक किरण धूप की मुझे छू कर गुजरी है
माँ
हाँ माँ बन गई हूँ मैं!

* * *

अमनदीप / विम्मी

१/१०/२०१८