मैं सही शब्दों की तलाश करूँगा
लिखूँगा एक मौसम,
एक सत्य कहने में
दुःख का वृक्ष भी सूख जाता है

घर जाने वाली सभी रेल
विलम्ब से चल रही हैं,
छिलके उतार रहा हूँ
मूँगफली के दानों के,
यह मेरे लिए सबसे सूक्ष्म श्रम है

मैं आदमी से नहीं
शहर से पीछा छुड़ाने के लिए
कविताएँ लिखता हूँ,
मैंने प्रेम कविताएँ लिखीं
और पटना को धोखा दिया

दीवार पर धूप के टुकड़े की याद में
रोता आदमी
घर से दूर आत्मीयता के किसी क्षण में
एक भीगते पत्ते की तरह हिलता है…

रोहित ठाकुर की कविता 'एक जाता हुआ आदमी'

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रोहित ठाकुर
जन्म तिथि - 06/12/1978; शैक्षणिक योग्यता - परा-स्नातक राजनीति विज्ञान; निवास: पटना, बिहार | विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं बया, हंस, वागर्थ, पूर्वग्रह ,दोआबा , तद्भव, कथादेश, आजकल, मधुमती आदि में कविताएँ प्रकाशित | विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों - हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि में कविताएँ प्रकाशित | 50 से अधिक ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित | कविताओं का मराठी और पंजाबी भाषा में अनुवाद प्रकाशित।

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