एक रात

रात हो गई है। चारों ओर सन्नाटा छा गया है। ग्राम के सघन वृक्षो में अँधेरा छिपा बैठा है। धुंधली चाँदनी अपने पंख फैलाये जैसे अनन्त आकाश में उड़ जाने के लिए पृथ्वी पर तैयार बैठी है। मैं चला जा रहा हूँ। शहर की अन्न कमिटी की मीटिंग अभी ही समाप्त हुई थी। एक मारवाड़ी कपड़े के व्यापारी के यहाँ जब वह बहस गर्म होने लगी थी, घर के कोने के मन्दिर में से घण्टियाँ बज उठी थीं और क्षण भर के लिए बहस करनेवालों के दिल हल्के हो गये थे। कुष्टिया जहाँ साइकिल रिक्शा के अलावा और कोई ख़ास सवारी नहीं थी, वहाँ अमरीकन लारी और ट्रकों के आ जाने से एक प्रकार की नवीनता आ गई थी। सारा टाउन चौक-चौंक उठा था।

मुझे याद आया आज जब कि खाने को नहीं मिलता था। चारों ओर संकट के बादल छा रहे थे। वह हिन्दू और मुसलमान मध्यवर्ग के प्राणी अब भी अपने स्वार्थों में लिप्त लड़ रहे थे। नुकीली दाढ़ीवाला एक मज़दूर बार-बार बीच में एका कराने का प्रयत्न करता था। जीवन की उस कठोरता के बाद यह नीरवता, यह शांति। मेरा मन जैसे एकबारगी सिहर उठा। चाँदनी में बंगाल की युगान्तर की करुण रागिनी मंद्र स्वर से स्नायवित कंपन-सा भर रही थी। मैं नहीं जानता सब ऐसा ही सोचेंगे, किन्तु मुझे यह प्रकृति का सौंदर्य एक स्वप्नलोक-सा लग रहा है। घर सो रहे हैं, दिन में वह अलसाते हैं। एक दिन उन्हें अपने ऊपर गर्व था किन्तु आज मानव को ही अपनी सत्ता एक अपमान के भंवर में पड़ी त्रस्त प्रतीत होती थी।

राह में एक टी स्टॉल पर मैं रुक गया। कुछ मज़दूर बैठे बातचीत कर रहे थे। धुंधले चिराग की रोशनी में मैंने देखा वह स्टॉल था, जिसके नाम ले लेने मात्र से यूरोप का वासी शायद इसका अन्दाज़ा न लगा सके। दो-तीन बेचें पड़ी थीं और कोने में बीड़ी के बंडल सजे धरे थे। देखा उन्होंने मुझे, मैं परदेसी लगता था। और वह मुझे देखकर टूटी-फूटी हिन्दी बोलने लगे। आगरे के डाक्टरी जत्थे की बात सुनते ही उनका अविश्वास हट गया। और हम घुल-मिलकर बातें करने लगे।

एक मज़दूर ने कहा- “आज 15 तारीख है। कोयले की कमी के कारण टेक्सटाइल मिल बन्द हो गई है। 3500 आदमी बेकार हो गये हैं। सरकार कुछ चिन्ता नहीं करती। चावल का दाम 16) रु. हो गया है।”

अभी वह चुप भी नहीं हुआ था कि एक आदमी तेज़ी से दौड़ता हुआ आया और कहने लगा- “छः गाड़ी चावल से भरी कोई अँधेरे में निकलवा ले जा रहा है।”

सुनते ही एक तहलका मच गया। मज़दूरों की आँखों में एकाएक खून छलक आया। मैंने देखा- यही शायद वह खून था जो रूस में भयानक नाज़ियों के मुँह पर चोट कर रहा था। यही था वह गुस्सा जो चीन में नंगे हाथों खड़ा जापान को ललकार रहा था। यही थी वह अवरुद्ध प्रतिहिंसा जो मार्शल टिटो के भुजदण्डों में फड़क उठी थी।

एक साथ कई मज़दूर हुंकार उठे। इससे पहले कि कोई कुछ कहे, एक लड़का बोल उठा- “पकड़ लो साले को।” और चार आदमी उस ख़बर देनेवाले के साथ दौड़ गये।

आदम, एक लड़का जो बीड़ी बेच रहा था, बोला- “क्यों थाने में भी तो रपट करवा दो।” और एक मज़दूर नहीं, फिर तीन-चार थाने की ओर चल दिये।

और मैंने सोचा- काश पूरे बंगाल की जनता ऐसी ही जाग्रत होती तो क्या…

चाय पीकर मैं हॉस्टेल की ओर चल दिया और मुझे वे दृश्य याद आने लगे…

एक दिन मुस्लिम विद्यार्थी चिल्लाने लगे- “श्यामाप्रसाद का नाश हो, श्यामाप्रसाद का नाश हो…”

पीछे-पीछे निकल आये हिन्दू विद्यार्थी क्रोध से पागल- “लीग मंत्रिमंडल का नाश हो…”

झगड़ा बढ़ने लगा… तभी न जाने कहाँ से आये स्टूडेन्ट फेडरेशन के लड़के और उनकी आवाज़ ने सबकी आवाज़ों को डुबा दिया। उन्होंने कहा- “किरनशंकर, सुहराव, श्यामाप्रसाद एक हो…”

उन्होंने कहा- “भूखा बंगाल एक हो…।”

भूखे बंगाल का शीशा चटका नहीं पिघलकर इकट्ठा हो गया। मन करता है मैं रो दूँ। कितना वैमनस्य और उसका परिणाम कितना भयानक? मनुष्य मर रहा है! कौन-सा है वह उद्देश्य, लक्ष्य या धर्म, जिसके पीछे हम लड़ें। कौन-सी है वह नैतिकता जो हमें आज भी परस्पर लड़ने की आज्ञा दे सकती है!

माँ अपने बेटे की लाश के पास बैठी रहे और आकर कोई कहे मैं तेरे बालक को जिला दूँ? माँ अविश्वास करे, किन्तु वैद्य अपने काम में लगा रहे और बालक में जीवन का संचार हो, तब माँ का हृदय कैसा होगा? यही तो मेरा भी हाल है।

क्यों नहीं समझता मनुष्य अपना स्वार्थ जो सबका स्वार्थ हो? क्यों वह परम्परा से स्वार्थ को व्यक्ति के संकुचित रूप में बाँधता रहा है? नफ़रत… नफ़रत ही है आज का ढाँचा, नफ़रत ही है आज का रूप। किन्तु इस दुःख और अत्याचार के भीतर रक्त है अभी भी मानवता का, वह जिसके प्रवाह से मनुष्य मनुष्य के रूप में टिका हुआ है।

न जाने क्यों हॉस्टेल पहुँचते ही मैं थक गया हूँ। आज मेरा दिमाग़ थक गया है। मैं बिल्कुल सूना सूना-सा हो गया हूँ। कोई पूछता है, क्या हुआ? मैं क्या जवाब दूँ। जब सिर में बड़ी ज़ोर की चोट लगती है तब झनझनाहट के अतिरिक्त कुछ नहीं जान पड़ता। यह घाव अब दर्द नहीं कर रहा है। आँसू निकले, छाती धक हो गई है। आज मैं अकाल की कहानियाँ सुनकर आया हूँ। क्यों न जाने वह सुनना मात्र एक सुनना ही बनकर नहीं रह गया। वह छायाचित्र बराबर कुछ पूछ रहे हैं जिसका जवाब वह कभी मनुष्य रहे होने के नाते मुझसे जानना चाहते हैं।

कुछ देर बाद सब सोने लगे। अब वह लड़का सो गया है जो थोड़ी देर पहले गा रहा था-

मरि जातो प्रेम
मरि जातो गान…

मैं सोचता हूँ यही दो चीज़ें जो मनुष्य को मनुष्य के रूप में रखती हैं, क्या आज उनको ही दाँव पर रखकर बंगाल नया जीवन चाहता है…

यह कलकत्ते का आबाद वीराना नहीं। यहाँ बहुत कम लोग हैं मगर जो हैं वह मनुष्य हैं। यहाँ भूखे, मरतों को देखकर मनुष्य को खुद भूख नहीं लगती, रोना आता है। यह उन्माद का उन्मत्त अट्टहास नहीं है, जहाँ मनुष्य केवल ढेर के ढेर करके छोड़ दिया गया हो, केवल हाहाकार करने, रोने, भीख माँगने और मरने…

मेरी आँखों के सामने चित्र नाचने लगे। अनेक, एक, घूमते, मिटते, बनते पूछते-पूछते…

और हरीपुर गाँव जो घनी छाया में ऊँघता-सा मचलता-सा, धूप और छाया में अल्हड़-सा पागल-सा आज सुनसान पड़ा था, अपने आप पर लज्जित एक व्याकुल विधवा की आह-सा। किसान लुट गये, कारीगर भाग गये। और मरने लगे सैकड़ों की तादाद में… वहीं… राह पर… घर में… बाज़ार में…

औरतों ने रोना छोड़ दिया, मर्दों ने घर लौटना… पतंग कटकर हवा में उड़ती रही और जैसे बालक उसके पीछे भागते हैं वैसे ही मौत और विनाश उसे घेरकर हँसने लगा…

विचार टूट गया। मैं आँख खोल रहा हूँ।

स्कूल के विद्यार्थी सो गये हैं। बेचारे बच्चे। किसी तरह अपने जीवन का बोझ ढोये चले जा रहे हैं। सो रहा है जसवंत, सो रहे हैं ज़ियाउद्दीन और भुइयाँ भी। कितनी कितनी दूर हैं इनके घर। किन्तु मैं जाग रहा हूँ। नहीं आ रही है मुझे नींद। नींद, वह जो ज़िन्दगी के जागने की एक नियामत है, एक गहरी माप है, जिसकी पतवारों के बल पर जागरण की नैया इस परिवर्तन की नदी में निरंतर बहती चली जाती है। मैं पहली बार नहीं, अनेक बार रात-रात जागा हूँ, किन्तु आज मन न भारी है, न है कोई भय की छाया। चाँदनी में पत्तियाँ सरसराती हैं, छोटी छायाएँ बड़ी हो जाती हैं फिर सिहरकर घास पर झूमने लगती हैं। मुझे नींद नहीं आ रही है।

कभी-कभी झपकी-सी आती भी है तो कोई अकेला नहीं रहने देता। जाने आकर कौन बात करने लगता है! जो सुना है वह मन में रह गया है। किन्तु कोई कहता है, वह क्या केवल कहानी ही थी जो तुम सुनकर चुप हो गये? क्या तुमने उसे समझा भी?

मैं कहता हूँ, मैं यदि नहीं भी समझा तो भी अपराधी मैं ही हूँ। क्या मनुष्य की पाप देखनेवाली आँखें अपराधिनी नहीं हैं?

मुझे नींद क्यों नहीं आती? तुम कौन हो? भयानक? क्या है? इस तरह क्यों आये हो?

‘मैं रूपलाल हैं। इसलिए नहीं कि मैं सुन्दर हूँ। मेरा नाम ही यह है। क्यों है यह मैं नहीं जानता। तुम मुझे भूलना चाहकर भी नहीं भूल सकते। मेरा जीवन एक कहानी बनकर नहीं रहना चाहता। मैं पिशाच नहीं हूँ, भूत नहीं हैं, मगर हूँ क्या? तुम नहीं जानते, मैं नहीं जानता।’

आवाज़ बन्द हो गई है। चाँद ज़मीन पर उतर आया है। कोई मेरे पास नहीं है। मैं क्यों कराह रहा हूँ? क्या रूपलाल मेरा कोई पुराना परिचित है? नहीं। किन्तु आज वह भूखा मर गया है, क़ानून में फँसकर मर गया है, वह क़ानून जिसमें निर्माण के लिए निर्माण नहीं केवल ध्वंस है…

करवट बदलकर मैं क्यों इतना विह्वल हों उठा हूँ?

हाँ, तो रूपलाल अगर तुम मर गये हो तो मैं तुम्हारे लिए ज़िम्मेदार कैसे हूँ। तुम थे मुझसे दूर इतने कि मैंने तुम्हारे जीवन में तुम्हारा नाम भी नहीं सुना था।

मगर तुम हँस क्यों दिये? जीवन में तो तुम्हें शायद इतनी अनुभूति का अवकाश ही न था। आज फिर क्यों? ओह, इसलिए कि हमारे समाज में सब एक दूसरे से बद्ध हैं। एक भी अपने आप में पूर्ण नहीं है।

रूपलाल के एक भाई था- जतीन मण्डल। पूरा कुटुम्ब था। कुटुम्ब सबका एक। एक दो मालिक, बाकी सब पलनेवाले। स्नेह भी, आशीर्वाद भी, अधिकार जितने उससे अधिक ज़िम्मेदारी, स्वतन्त्र विचारों की हत्या।

परम्परा का वह संगठन। वह दिन तो बीत गये। माँझी! टूट गये थे जाल, लहरों के जाल ने जिन्हें काट दिया था। रूपलाल नदी पर जाता, फँसती मछली, डूब जाती वह अतल में, डूब जाता रूपलाल का हृदय भी । साँस लेने को तो फिर फिर बाहर आना ही पड़ता। देखता रूपलाल…

आया अकाल, आया हाहाकार।

और एक दिन वह जाकर लाया कुछ चावल टाउन से। था केवल एक व्यक्ति के योग्य। जब घर आया तो देखा प्राणबाला बैठी शून्य दृष्टि से आकाश की थाह ले रही थी।

रूपलाल उसे चावल देकर चला आया कि पका दीजो। और वह पकाने लगी।

जब रूपलाल लौटकर आया उसने देखा प्राणबाला वह भात खा चुकी थी। और दोनों बच्चे भूखे चिल्ला रहे थे।

रूपलाल के हाथ में अपने आप गँडासा चमक उठा।

जतीन मण्डल की स्त्री- हरिदासी आई थी प्राणबाला को बचाने। पर खुद भी कब बचा सकी वह प्राणबाला को, उसके दो बच्चों को, रूपलाल की स्त्री को, रूपलाल के दो बच्चों को.. अपने आपको…

रूपलाल ने थाने में जाकर खुद अपनी रिपोर्ट लिखवाई और आत्मसमर्पण कर दिया।

बात ख़त्म हो गई। मैं सोने का प्रयत्न करता हूँ; मगर यह कौन सामने खड़ा है।

वही रूपलाल! हत्यारा!! खूनी!!! अरे, तुम रो क्यों रहे हो रूपलाल – मैं उससे एकाएक ही पूछ बैठा।

‘रोऊँ भी नहीं! तुम भी मुझे हत्यारा समझते हो? सच कहो! क्या तुम मुझसे नफ़रत करते हो?’

मैं इसका जवाब नहीं दे सकता। रूपलाल का कोई कसूर नहीं। ठीक है, जब रूपलाल स्वयं थाने में जा खड़ा हुआ कि वह पकड़ लिया जाये, क्योंकि उसे जीने की इच्छा न थी, तब क्या उसका मतलब जीने से था? नहीं, वह चलती-फिरती मौत नहीं चाहता था। वह नहीं चाहता था कि असली खूनियों के हाथ-पैर आज़ादी से अत्याचार करते रहें और उनके पाप की छाया में वह सदा के लिए रँग दिया जाए।

रूपलाल हँस उठा। वह कह रहा है- ‘तुम क्या जानो? तुमने क्या मुझे तब देखा था जब मैं भूखा था?’

वह अट्टहास कर उठा। ‘तब? तब आसमान में न तारे थे, न पैरों के नीचे ज़मीन। चारों और अँधेरा ही अँधेरा नज़र आता था। मैं प्राणबाला को प्यार करता था और संसार ने गरीबी के कारण सदा यह समझा कि मेरा प्यार प्यार नहीं मेरा स्वार्थ था, एक नियम! सचमुच! किन्तु जिस दिन मैंने अपने हाथों से अपनी बहू और बच्चों का खून किया था उस दिन मैं रूपलाल नहीं था, उस दिन कोई मेरा नहीं था, मैं किसी का नहीं था, मैं तो रूपलाल की छाया भी न था। बाबू उस दिन मैं भूखा था।

मैं पूछना चाहता हूँ कि खून करके क्या मैंने पाप किया है। तड़पते हुए पशु को गोली मारकर उसकी यन्त्रणा से उसे मुक्ति देना, जिसके पास अपना दुख समझाने को शब्द नहीं हैं उसे समाप्त कर देना क्या पाप है? हमारे लिए जीने और मरने में फर्क ही क्या था बाबू…

प्राणवाला? उसने बच्चों को भी न देकर खुद खा लिया था, वह उस दिन राक्षसी थी, मैं महाराक्षस था। कौन नहीं था राक्षस उस दिन? बाबू क्या दो दाने चावल में इतनी शक्ति है कि वह एक दिन में दुनिया पलट दे। मैंने बच्चों को नहीं, बुड्ढों को अपना अँगूठा चबाते देखा है।’

एक सवाल है- खूनी कौन है?

दूसरा सवाल है- अपराध किसका है?

और उसके बाद सवालों की बाढ़ है…

मैं चौंक उठा हूँ। कौन था वह रूपलाल जो मुझसे आकर बातें करने लगा था? मैं देख रहा हूँ? क्या यह देखना ही काफी होगा? क्या वह सत्ता केवल मशीन थी- बनी बिगड़ी… और मैं सोचता हूँ मैं फाँसीघर में लेटा हूँ, कब्रिस्तान में लेटा हूँ, मरघट मेरे चारों ओर है… मैं बंगाल में पड़ा देख रहा हूँ…

और याद आने लगा मुझे। सुबह धीरेन ने जो कहा था- एक एक अक्षर याद आने लगा मुझे।

मई में फ़रीदपुर ज़िले में कुष्टिया से भी गई बीती हालत थी। जो पंद्रह सौ आदमी हमने यहाँ खिलाये थे उनमें क़रीब सात सौ फ़रीदपुर के थे।

दो जवान किसान औरतें- मुसलमान | पूछा उनसे- घर क्यों छोड़ दिया है?

उन्होंने कहा- मरद सब छोड़ गये हमें। प्रतीक्षा करते-करते हमें कई दिन बीत गये। बाबू भूखा नहीं रहा गया। हम दोनों देवरानी जिठानी हैं। अन्त में झोंपड़े छोड़ने पड़े। मेरे एक बेटा और एक बेटी थी, उसके थी एक लड़की।

धीरेन ने कहा वह न रोईं, न ली उन्होंने कोई आह। केवल कहा- वह सब भी मर गये। और पाँच-छः दिन बाद हमने देखा- वह दोनों औरतें, बाज़ारू औरतों के घरों में चली गई। शायद पचीस या तीस फ़ीसदी औरतों की यही गत हुई…

मैं और कुछ नहीं कहता- वह देवियाँ थीं? अप्सरा थीं? मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं। मैं केवल यही सोच रहा हूँ, किसके माँ नहीं है, किसके बहन नहीं होगी? क्या यही सब कुछ हमारी नारी का अन्त है…

मुट्ठी भर अन्न है तो इन्सान सुकरात है और यदि वही नहीं तो वह क्या नहीं है…?

क़ुरान की क़सम खाकर मर्द छोड़ गये, आबरू को औरतों ने अपने हाथ से खोल दिया, बच्चे सर नीचा करके मर गये… क्या यही ज़िन्दगी का अम्बार है, मौत का मैख़ाना… हड्डियों की चहल-पहल…

मैं सोचता हूँ, क्या हुआ होगा उन औरतों का जब दूध रहा न होगा छाती में और बच्चे दम तोड़ रहे होंगे? ज़हर न हो गया होगा दिल के चारों तरफ़ का खून? खून… वह जिसकी ज़ंजीर में माँ-बच्चे के ऊपर हाथ रखे थी और बच्चे ने उसकी तरफ़ मासूम आँखों से देखा था। क्या हो गया वह स्वर्ग का झूठा इल्हाम कि घर – इन्सान का परिवार – ईश्वर तोड़ता है –  मनुष्य नहीं । क्या वह औरतों की जवानी अस्मत के कपड़े के तार-तार होकर चीथड़े बन जाने के लिए थी या गन्दी गलीज़ घृणित बीमारियों का एक लबादा बनने के लिए जो हर ओढ़नेवाले को कोढ़ की तरह गला देती और नाख़ूनों तक गल जाती पीब-पीब करके, अपने आप।

और वह भूख जब माँ ने कहा वह माँ नहीं थी रंडी थी- हाँ रुपया अन्न था, क्योंकि अन्न रुपये के लिए था, खाने के लिए और टूक-टूक होते कलेजे के लिए सबसे अच्छी दवा, सबसे बड़ी सांत्वना थी—मौत!

मौत जिसने ठोकर मारकर बंगाल की पसलियों को तोड़ दिया और हँस दी, जब लाभ के रुपयों से निरंतर खनखन का महानाद गूंजने लगा। बंगाल की भूमि को शस्यश्यामल बनानेवाली गंगा और ब्रह्मपुत्र का कलकल डूब गया उस ध्वनि में। गला भींच दिया किसी ने कवि ठाकुर का, अवरुद्ध श्वास छटपटा उठी। ‘सप्तकोटि’ जनता और कराहों पर वह ध्वनि भीषण मांसाहारी जीव की तरह कच्चा चबा जाने को मंडराने लगी।

और वह औरतें मुझसे पूछ रही हैं- क्या हमें मर जाना चाहिए था।

गूँज रहा है यह सवाल!

जवाब देना होगा, देना होगा जवाब- उनको जिन्होंने उन्हें ऐसा बनाया अनाज चुराकर, उन्हें जो जिम्मा लेकर न कर सके इन्तज़ाम। देना होगा हमें जवाब कि हम जीवित रहे और हमारे खून का एक-एक क़तरा भी न बचा सका हमारी माँ की अस्मत – माँ जिसने हमारे मरने पर रोना छोड़ दिया और जिसका पति उसे झोपड़ी के बांस समझकर छोड़ गया, अपने हाथों अपनी अंतड़ियाँ पकड़े…

आज मैं रोऊँगा नहीं क्योंकि रोकर नहीं बचेगा बंगाल। बनानी होगी यह नमी हमें उन खूनियों के प्रति नफ़रत की आग में भाप, जो तहस-नहस कर दे डाकुओं और ठगों का वह गिरोह जो खून से भीगे दाँत लेकर हँस रहा है और जिसकी कड़ी उँगलियों में फँसी माँ की गर्दन अभी छटपटा रही है।

मैं बिस्तर पर काँप नहीं रहा हूँ। हवा तेज़ी से चल रही है। आज मैं जवाब चाहता हूँ। कोई मेरे भीतर अपनी पूरी शक्ति लगाकर चिल्ला रहा है-

मा भैः, मा भैः, मा भैः…