एक सत्य

‘Ek Satya’, a poem by Anupama Jha

जब
लिखी जाती है कविता
गौर वर्णा स्त्रियों पर,
पहनायी जाती है शब्दों से
रंग-बिरंगी चूड़ियाँ
गोरी कलाइयों पर,
विशेषणों में लग जाती है होड़
सँवारने को रूप, उस गौर वर्णा के
तब
चुपचाप सब पढ़ती है ‘वो’
वो सब कविताएँ
जिन्हें सुन्दर नहीं कहा, माना जाता।
कभी काली, कभी बदसूरत कही जाती है
विचित्र नामों से भी पुकारी जाती है
गौर वर्णो के आगे कम ही
दुलारी जाती है।
अंतर्मन के सवालों से
ख़ुद को सँवारती
ख़ुद के लिए
सवालों को उठाती है।
सुना है आजकल
स्त्री-विमर्श का बोलबाला है
क्या होता है मुद्दा
इन विमर्शों में?
क्या कहते मनोचिकित्सक?
किसने ज़्यादा नुकसान किया
लिंग भेद या रंग भेद?
दोनों तो
घर से ही शुरू होते हैं न?
फिर सारे प्रश्नों को अनुत्तरित करके
बढ़ती है आगे वो
ख़ुद को फिर से समझाती
तनिक व्यंग्य से मुस्काती
कृष्ण भी मात्र शिकायत करके रह गए!
राधा क्यूँ गोरी
मैं क्यूँ काला?
फिर मेरी क्या बिसात?
फिर आश्वस्त हो ख़ुद से
चल पड़ती है
उन दुकानों की ओर
जहाँ बेचा जाता है झूठ
दिखाकर विज्ञापनों में,
उन्हीं स्त्रियों को
जिन पर लिखी जाती है कविता
और बनाए जाते हैं बड़े-बड़े होर्डिंग
जो टंगे-टंगे ही करते हैं
कितने ही भावनाओं का क़त्ल
जिन पर नहीं लिखी जाती कोई कविता…

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