मुझे एक अफ़सोस है, वह अफ़सोस यह है कि मैं उन्हें पूरे अर्थों में शहीद क्यों नहीं कह पाता हूँ! मरते सभी हैं, यहाँ बचना किसको है! आगे-पीछे सबको जाना है, पर मौत शहीद की ही सार्थक है, क्योंकि वह जीवन की विजय को घोषित करती है। आज यही ग्लानि मन में घुट-घुटकर रह जाती है कि प्रेमचंद शहादत से क्यों वंचित रह गए?

मैं मानता हूँ कि प्रेमचंद शहीद होने योग्य थे, उन्हें शहीद ही बनना था। और यदि नहीं बन पाए हैं वह शहीद तो मेरा मन तो इसका दोष हिन्दी संसार को भी देता है।

मरने से एक सवा महीने पहले की बात है, प्रेमचंद खाट पर पड़े थे। रोग बढ़ गया था, उठ-चल न सकते थे। देह पीली, पेट फूला, पर चेहरे पर शांति थी।

मैं तब उनकी खाट के पास बराबर काफ़ी-काफ़ी देर तक बैठा रहा हूँ। उनके मन के भीतर कोई खीझ, कोई कड़वाहट, कोई मैल उस समय करकराता मैंने नहीं देखा। देखते तो उस समय वह अपने समस्त अतीत जीवन पर पीछे की ओर भी होंगे और आगे अज्ञात में कुछ तो कल्पना बढ़ाकर देखते ही रहे होंगे लेकिन दोनों को देखते हुए वह सम्पूर्ण शांत भाव से खाट पर चुपचाप पड़े थे। शारीरिक व्यथा थी, पर मन निर्वीकार था।

ऐसी अवस्था में भी (बल्कि ही) उन्होंने कहा— “जैनेन्द्र! लोग ऐसे समय याद किया करते हैं ईश्वर। मुझे भी याद दिलायी जाती है। पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की ज़रूरत नहीं मालूम हुई है।”

शब्द हौले-हौले थिरता से कहे गए थे और मैं अत्यंत शांत नास्तिक संत की शक्ति पर विस्मित था।

मौत से पहली रात को मैं उनकी खटिया के बराबर बैठा था। सबेरे सात बजे उन्हें इस दुनिया पर आँख मीच लेनी थीं। उसी सबेरे तीन बजे मुझसे बातें होती थीं। चारों तरफ़ सन्नाटा था। कमरा छोटा और अँधेरा था। सब सोए पड़े थे। शब्द उनके मुँह से फुसफुसाहट में निकलकर खो जाते थे।

उन्हें कान से अधिक मन से सुनना पड़ा था।

तभी उन्होंने अपना दाहिना हाथ मेरे सामने कर दिया, बोले— “दाब दो।”

हाथ पीला क्या सफ़ेद था और फूला हुआ था, मैं दाबने लगा।

वह बोले नहीं, आँख मींचे पड़े रहे। रात के बारह बजे ‘हंस’ की बात हो चुकी थी। अपनी आशाएँ, अपनी अभिलाषाएँ, कुछ शब्दों से और अधिक आँखों से वह मुझपर प्रगट कर चुके थे। ‘हंस’ की और साहित्य की चिंता उन्हें तब भी दबाए थी। अपने बच्चों का भविष्य भी उनकी चेतना पर दबाव डाले हुए था। मुझसे उन्हें कुछ ढाढ़स था।

अब तीन बजे उनके फूले हाथ को अपने हाथ में लिए मैं सोच रहा था कि क्या मुझ पर उनका ढाढ़स ठीक है। रात के बारह बजे मैंने उनसे कुछ तर्क करने की धृष्टता भी की थी। वह चुभन मुझे चुभ रही थी। मैं क्या करूँ? मैं क्या करूँ?

इतने में प्रेमचन्द जी बोले, “जैनेन्द्र!”

बोलकर, चुप मुझे देखते रहे। मैंने उनके हाथ को अपने दोनों हाथों से दबाया। उनको देखते हुए कहा, “आप कुछ फ़िक्र न कीजिए बाबूजी। आप अब अच्छे हुए और काम के लिए हम सब लोग हैं ही।”

अब मुझे देखते, फिर बोले— “आदर्श से काम नहीं चलेगा।”

मैंने कहना चाहा… “आदर्श…”

बोले— “बहस न करो।”

कहकर करवट लेकर आँखें मींच लीं।

उस समय मेरे मन पर व्यथा का पत्थर ही मानो रख गया। अनेकों प्रकार की चिंता-दुश्चिंता उस समय प्रेमचंद जी के प्राणों पर बोझ बनकर बैठी हुई थी। मैं या कोई उसको उस समय किसी तरह नहीं बँटा सकता था। चिंता का केन्द्र यही था कि ‘हंस’ कैसे चलेगा? नहीं चलेगा तो क्या होगा? ‘हंस’ के लिए तब भी जीने की चाह उनके मन में थी और ‘हंस’ न जिएगा, यह कल्पना उन्हें असह्य थी, पर हिन्दी-संसार का अनुभव उन्हें आश्वस्त न करता। ‘हंस’ के लिए न जाने उस समय वह कितना झुककर गिरने को तैयार थे।

मुझे यह योग्य जान पड़ा कि कहूँ… ‘हंस’ मरेगा नहीं, लेकिन वह बिना झुके भी क्यों न जिए? वह आपका अख़बार है, तब वह बिना झुके ही जिएगा। लेकिन मैं कुछ भी न कह सका और कोई आश्वासन उस साहित्य-सम्राट को आश्वस्त न कर सका।

थोड़ी देर में बोले— “गरमी बहुत है, पंखा करो।”

मैं पंखा करने लगा। उन्हें नींद न आती थी, तकलीफ़ बेहद थी। पर कराहते न थे, चुपचाप आँख खोलकर पड़े थे।

दस-पंद्रह मिनट बाद बोले— “जैनेन्द्र, जाओ, सोओ।”

क्या पता था अब घड़ियाँ गिनती की शेष हैं, मैं जा सोया। और सबेरा होते-होते ऐसी मूर्छा उन्हें आयी कि फिर उनसे जगना न हुआ।

हिन्दी संसार उन्हें तब आश्वस्त कर सकता था, और तब नहीं तो अभी भी आश्वस्त कर सकता है। मुझे प्रतीत होता है, प्रेमचंद जी का इतना ऋण है कि हिन्दी संसार सोचे, कैसे वह आश्वासन उस स्वर्गीय आत्मा तक पहुँचाया जाए।

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जैनेन्द्र कुमार
प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में जैनेंद्रकुमार (२ जनवरी, १९०५- २४ दिसंबर, १९८८) का विशिष्ट स्थान है। वह हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक के रूप में मान्य हैं।

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