‘Fauji’, a story by Hansa Deep

भारत में बग़ैर आरक्षण के रेल में सफ़र करने की चुनौती को हम मध्यवर्गीय लोग क़तई स्वीकार नहीं करते, बशर्ते, हालात् मजबूर न कर दें। ऐसी ही यात्रा करनी थी हमें वास्को से बंगलौर तक। चूंकि गाड़ी वास्को से ही शुरू होती थी, इसलिए कुली ने सौ रुपए लेकर जनरल कोच में आरक्षण कर दिया। वे सौ रुपये भी बहुत खटकते रहे जब गाड़ी चलने पर भी डिब्बा लगभग ख़ाली ही रहा। उस अनायास मिले स्वर्गिक सुख को भोगते हुए हम चारों प्राणी अलग-अलग सीट पर लेट गए। मानो ज़िन्दगी में फिर कभी भारतीय रेल में ऐसा मौका हाथ लगे, न लगे। भीड़-भड़क्का, धक्कम-पेल, इंच दर इंच के लिए लड़ाई-झगड़ा, सबसे दूर।

गाड़ी का धीमा होना इस बात की सूचना दे रहा था कि कोई स्टेशन आ रहा है। गर्दन निकालकर मैंने पढ़ने की कोशिश की- मड़गांव स्टेशन था। मैंने इत्मीनान से पाँव और फैला लिए। अमित कनखियों से मुझे देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। हम सभी जैसे इन क्षणों को अपने भीतर जमा पूँजी की तरह सँजो रहे थे।

धीरे-धीरे शोर नज़दीक आने लगा, हमारे डिब्बे से होते हुए सीट के आस-पास तक। सभी के मन में धुकधुकी होने लगी। अंग-प्रत्यंग एकाएक सिमटने लगे। अपनी जगह जाने के आसार साफ नज़र आ रहे थे। सामने से एक के बाद एक, फौजी वर्दी में, बंदूक से लैस, तक़रीबन पच्चीस-तीस जवान घुस आए। बड़े-बड़े संदूकों और भारी जूतों की खटर-पटर से डिब्बा गूँज गया। दोनों बच्चियाँ, जो इतनी देर से कुलांचें भर रही थीं, खिड़की के पास डरी सहमी-सी बैठ गईं।

भौंचक्के से अमित ने हम सबको एक सीट पर आने के लिए कहा। पूरे डिब्बे में अकेली महिला यात्री होने के अहसास ने मुझे बुरी तरह डरा दिया। उनके बड़े-बड़े बक्से देख कर यह तय लगा कि वे जल्दी उतरने वाले नहीं हैं। यानि रात-भर का सफ़र। हजारों संदेह मुझे घेरने लगे। एक से एक भयानक फिल्मी दृश्य आँखों में नाचने लगे। कहीं रात में बोतलें खुल गईं तो? ये डिब्बा…

“क्यों ये डिब्बा बदल लें?”

मैंने सहमी आवाज में अमित से पूछा, तो उनका आक्रोश आँखों में उतर आया –

“दिमाग़ ठिकाने है तुम्हारा? जैसे पूरी गाड़ी के ख़ाली डिब्बे अब तुम्हारा इन्तज़ार कर रहे हैं।”

मैंने लम्बी सांस खींच कर मुआयना किया। सभी फौजी तेज़ी से अपना सामान जमा रहे थे। ठीक हमारे सामने वाली सीट पर तीन कद्दावर, बड़ी, घनी मूँछों वाले फौजी बैठ चुके थे। उनके द्वारा विविध हिदायतें दी जा रही थीं। शायद वे उनके अधिकारी थे। उनकी आवाज़ पूरे डिब्बे में गूँज रही थी।

“मम्मी ये मिलट्री है?”

नौ वर्षीय अन्नू, जो मीनल से दो वर्ष बड़ी है, स्वयं को रोक नहीं पाई।

“हूँ।”

“इनके पास कार नहीं होती?”

अन्नू की जिज्ञासा पर उसका सामान्य ज्ञान हिलोरें मारने लगा।

“होती हैं, बहुत सारी कारें, जीपें, गाड़ियाँ सब। इनके लिए रिजर्व डिब्बा भी होता है।”

“तो फिर ये लोग यहाँ क्यों आए?”

मैं असमंजस में थी कि क्या कहूँ, मेरी खीझ शब्दों में उतरना चाहती थी। कोने में बैठा हुआ अधिकारी, जो अपने जूते के फीते ढीले कर रहा था, मुस्कुराता हुआ अन्नू से बोला –

“हमारी गाड़ी अचानक ज़रूरी काम से चली गई इसलिए हमें ट्रेन पकड़नी पड़ी। अब तो तुम्हारे साथ चलेंगे।”

फौजी के इस जवाब ने थोड़ा ढाढ़स बंधाया। संवादहीनता कई शक और संदेह को जन्म देती है। अपनी बेचैनी और डर दूर करने के लिए मैंने मुस्कुराते हुए नन्हीं मीनू से कहा- “चलो हम साँप-सीढ़ी खेलते हैं।”

अपने दिलों की बोझिलता को कम करने का प्रयास करते हुए, हमने साँप-सीढ़ी ली और अमित, अन्नू को ताश पकड़ाकर खेल में व्यस्त होने का ढोंग करने लगे।

आदमी ख़ुद से ही डरने लगे, तो निर्भय होने को स्वांग ज़रूरी हो जाता है। मैं कनखियों से लगातार फौजियों की गतिविधियों का जायज़ा ले रही थी। कुछ दरवाज़ों के पास खड़े-खड़े बतिया रहे थे, तो कुछ पसीना पोंछते हुए, शौच आदि से निपट रहे थे। शेष सारे अपनी-अपनी जगह बनाकर, अपने अधिकारियों की आँखों से दूर, सफ़र का आनन्द उठा रहे थे।

मीनू के पानी माँगने पर मैं उठी तो वह रौबीला अधिकारी सरककर मेरी गोटों से खेलने लगा। नन्हीं मीनू की खीझ, डर और मम्मी पर ग़ुस्सा देखते ही बनता था। उसकी चाल चलने की गति धीमी हो गई थी। पर खेल चल रहा था। मैं अमित के पास बैठ गई। अमित-अन्नू दोनों की नज़रें मीनल की ओर ही थीं। फौजी को कैसे कहें कि तुम्हारी वर्दी के रौब में बच्ची डर रही है।

इस सबसे बेख़बर, साँप-सीढ़ी का साँप निडर होकर फौजी को काटने लगा। उसके सामने क्या बच्चा, क्या फौजी! जैसे-जैसे फौजी को साँप काटने लगे, वैसे-वैसे मीनू की किलकारियाँ बढ़ने लगीं। हमें लगने लगा कि वह भी आदमी है। बंदूक का ख़ौफ़ आहिस्ता-आहिस्ता कम होने लगा। मीनू को विश्वास हो चला कि बन्दूक के बल पर फौजी, साँप से नहीं बच सकते। अन्नू-मीनल दोनों बच्चियों को तालियाँ बजाते, किलकते देख फौजियों को ख़ूब मज़ा आने लगा। पल-भर में वे ‘अंकल’ बन गए। स्नेह की हल्की-सी फुहार ने रिश्ते प्रस्फुटित कर दिए।

बेचारे अंकल को एक बड़े साँप ने काटा और मीनू जीत गई। सभी फौजी हंस दिए। बच्चों से हारने का आनन्द भी अपरिमित उल्लास देता है, मैंने पहली बार जाना। अपने जीतने की ख़ुशी में, मीनू तीनों अंकल को मठरी, नमकीन पूड़ी, बेसन के लड्डू आदि खिलाने लगी, आग्रहपूर्वक। उन अधिकारियों को घर की बनी चीज़ें बहुत दिनों में नसीब हुई होंगी सो वे बड़े चाव से खा रहे थे। उनकी आँखों में चमक आ गई। मुझे लगा ‘घर’ का ख़्याल कठोर से कठोर आदमी को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ देता है।

अब नन्हीं मीनल, पूरे फ़ॉर्म में आ गई थी। सीट पर बैठना उसके लिए दुश्वार था। किसी जंग जीते हुए सुल्तान की तरह ठसककर चल रही थी। कभी बन्दूकों की गिनती लगाती, तो कभी उनकी कैप सिर पर पहनकर घूमती। अधिकारियों की आँख से ओझल होते ही जवान उसे घेर लेते। उसे मनाते, कि हमारे साथ खेलो, हमें भी मठरी खिलाओ, परन्तु नन्हा दिमाग़ यह समझ रहा था कि ये सब छोटे अंकल हैं। बड़े अंकल तो उसके पास बैठे हैं। वह तुनककर कहती- “जाने दीजिए, नहीं तो आपके बड़े अंकल से शिकायत कर दूँगी।” उसके ऐसे तर्कों से सभी खिलखिला पड़ते।

खिलखिलाहटों के बाद क्षणिक मौन कौंध गया डिब्बे में। मुझे लगा सभी, अपने परिवार और बच्चों की याद में खोने लगे हैं। अन्नू-मीनल को तो मौक़ा मिलना चाहिए। स्कूल, पढ़ाई, दोस्त, जोक्स और पहेलियाँ सब एक के बाद एक बग़ैर विराम के सुनाती जा रही थीं। बच्चों का संसार कितना व्यापक और उन्मुक्त होता है-

“अरे अंकल, इतना भी नहीं समझते आप?”

“आपने तो एक भी पहेली नहीं बूझी!” जैसे वाक्यों पर उन फौजी अधिकारियों की बेतहाशा ख़ुशी झलक रही थी। मैं और अमित, बच्चों की मासूमियत पर रश्क कर रहे थे। संवादहीनता की दीवार बच्चे जितनी जल्दी तोड़ देते हैं, हमारे लिए कहाँ संभव हो पाता है?

“अरे, वह देखो, पापा-मम्मी, अंकल, दूध ही दूध…!”

सचमुच दूर पहाड़ी के बीच, दुग्धसागर फ़ॉल अपनी सम्पूर्णता के साथ दिखाई दे रहा था। आसपास प्रकृति की हरीतिमा और तेज़ गति से कण-कण उफ़ान पाता हुआ पानी। प्रकृति का मुग्ध रूप अपनी सम्पूर्ण जीवन्तता में, इस दृश्य में मूर्त होता लगता था। दूध-सा दिखाई देता पानी!

“अंकल ये दूध है क्या?”

“हूँ, चलो हम बोतलों में भर लेते हैं, चाय बनाएँगे।”

“तो पहले गाड़ी तो रुकवाइए। हमको दूध के पैसे ही ख़र्च नहीं करने पड़ेंगे।”

मीनू की आवाज़ में अबोध मासूमियत के साथ, बुज़ुर्गाना अन्दाज़, हँसने-हँसाने के लिए भरपूर अवसर दे रहा था।

रात के आठ बज गए। विपरीत दिशा में भागते हुए पेड़, नदी, नाले, गाँव और शहर सब स्मृति से ओझल होने लगे। भूख लग आई थी। नौ बजते-बजते खाना आ गया। अन्नू-मीनल थोड़ा-बहुत खाकर ऊँघने लगी थीं।

अभी हम लोग ठीक से खा भी नहीं पाए थे कि किसी बड़े से स्टेशन पर गाड़ी रुकी। भीड़ का रेला बढ़ता हुआ हमारे डिब्बे की ओर ही आ रहा था। शोर-शराबे के साथ नारेबाजी भी हो रही थी। पता लगा, ये सब किसी राजनीतिक पार्टी की रैली में भाग लेने बंगलौर जा रहे हैं। उस अनियंत्रित भीड़ ने जैसे हम पर आक्रमण कर दिया। जगह बिल्कुल न होने के बावजूद, सब घुसे चले आ रहे थे। जवानों ने उन्हें रोकना चाहा, तो गालियाँ, सीटियाँ सब शुरू। चारों ओर से खिड़की-दरवाज़े थपथपाए जा रहे थे।

कार्यकर्ताओं की भीड़ ने पूरी गाड़ी पर आतंक फैला दिया था। अपनी पार्टी की ताक़त जताने का यह सुनहरा मौक़ा था उनके लिए। नशे में झूमते हुए वे लोग, बेहद बेहूदा हरकतें कर रहे थे। अधिकारियों ने हमें आश्वस्त करते हुए, एहतियात के तौर पर, ऊपर वाली सीट पर बैठने को कहा और सभी जवानों को सतर्क करते हुए, भीड़ पर नियंत्रण पाने की कोशिश करने लगे।

बरसाती पानी के तेज़ बहते रेले की तरह एक जत्था अंदर घुस आया और चौतरफ़ा हमला बोल दिया। जवानों ने उन्हें गली में रोक लिया। हमारी सीट के पास, दोनों रास्तों पर धड़ाधड़ सारे बक्से जमा दिए गए। ऊपर की जाली से मुझे देखते हुए, वे अश्लीलता पर उतर आए। मैं जमीन में गड़ी जा रही थी। विचित्र स्थिति थी। हाथ-पाँव में जैसे जान ही नहीं थी। अकेली महिला यात्री होने का वह काल्पनिक भय, अब भयानक यथार्थ था।

उन्हें देख ऐसा लग रहा था, जैसे इस तरह के तमाशे ही उनकी दिनचर्या हो। पूरा प्रयास था उनकी ओर से, किसी भी तरह फौजियों के धैर्य को तोड़ा जाए। अपनी आँखों से पहली बार देखा फौजियों का संयम, अनुशासन और चतुराई। कुछ ही मिनटों में सबने अपनी बंदूकें एक जगह जमा कर दीं। जूते और बेल्ट कसकर आदमियों की सघन दीवार बन गए वे। रैली के लिए जुटाई गई भीड़, मर्यादा की सभी सीमाएँ लाँघ चुकी थी। हर बड़े स्टेशन पर, जहाँ गाड़ी ज़्यादा देर रुकी, कैंटीन वालों को लूटा गया।

पूरी रात का एक-एक पल आशंकाओं के साए में गुज़ारते हुए, बंगलौर प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ी रुकना, काली रात के बाद सुबह की लालिमा छाने का संकेत था। भीड़ के बादल छंट गए। फौजियों से विदा लेते हुए, हमारे होंठ तो चुप थे, पर आँखों की पोरों में बहुत कुछ सिमट आया था। और वे, इस अलविदा की घड़ी में बूट और बेल्ट में अपने-आप को कसकर अपनी बन्दूकें सम्भाल रहे थे।

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हंसा दीप
डॉ. हंसा दीप टोरंटो, कैनेडा मेघनगर, जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश में जन्म। हिन्दी में पीएच.डी., यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। कैनेडियन विश्वविद्यालयों में हिन्दी छात्रों के लिए अंग्रेज़ी-हिन्दी में पाठ्य-पुस्तकों के कई संस्करण प्रकाशित। प्रसिद्ध अंग्रेज़ी फ़िल्मों – हैनीबल, द ममी रिटर्नस, अमेरिकन पाई, पैनीज़ फ्रॉम हैवन व अन्य कई फिल्मों के लिए हिन्दी में सब-टाइटल्स अनुदित। उपन्यास “कुबेर”, व “बंद मुट्ठी”, कहानी संग्रह “चश्मे अपने-अपने” प्रकाशित। साझा संकलन – “बारह चर्चित कहानियाँ”। उपन्यास व कहानियाँ गुजराती व मराठी में अनुदित। आकाशवाणी इंदौर व भोपाल से लगभग पचास कहानियाँ व नाटक प्रसारित। वागर्थ, कथाबिम्ब, भाषा, कथाक्रम, लहक, परिंदे, विभोम स्वर, यथावत, विश्वगाथा, समहुत, दस्तक टाइम्स, चाणक्य वार्ता, गंभीर समाचार, विश्वा, उदय सर्वोदय, समावर्तन, गर्भनाल, सेतु, कालजयी, साहित्य अमृत, चेतना, सुबह सवेरे आदि प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित। [email protected] + 647 213 1817 1512-17 Anndale Drive, North York, Toronto ON-M2N2W7, Canada