हम पुराने दोस्त थे,
हम बहुत पुराने दोस्त थे,
साथ-साथ पढ़े, साथ-साथ खेले
और साथ में बचपन की परीक्षा पास कर के जवानी में दाख़िला लिया,
साथ-साथ भारी हुई हमारी आवाज़,
साथ-साथ उगे हमारे चेहरे पर बाल,
कई दफ़ा हमने साथ-साथ बनवाई शेव,
साथ-साथ निचोड़ना सीखा अपना बदन,
साथ ही जगी लड़कियों में हमारी उत्सुकता,
हमने साथ में खरीदा नोकिया 26-26 फ़ोन।
पहली बार चित्रा टाकीज में साथ छुपकर देखी
हमने सलमान खान की ‘तेरे नाम’ फ़िल्म,
फिर हम साथ-साथ बने घूमते रहे राधे
और ढूँढते रहे अपनी-अपनी निर्झरा।
इसी के चलते हमने साथ में बनाया था
फेसबुक एकाउंट,
और अब हम बहुत पुराने दोस्त
सोशल मीडिया पर नए-नए दोस्त बने थे,
ये बाद में पता चला कि हम मैसेंजर पर एक ही लड़की से करते थे बात
एक फ़िक्र में था, दूसरा फ़िराक़ में।
इस तरह हम बहुत कमीने दोस्त भी थे।
फिर एक दिन एक हादसे में, हम में से एक मर गया।
तब पहली बार बचे हुए एक ने ‘है’ से ‘था’ के बीच की अनन्त दूरी और पीड़ा को महसूस किया,
मन दुखने की ये सबसे तीव्र क्रिया थी।
पर फिर कुछ दिनों बाद सीने में फसी साँस आहिस्ता से ढीली हुई,
तभी हम में से एक ने, बड़ी हिम्मत से, मरे हुए दूसरे का नम्बर डिलीट किया और फेसबुक पर उसकी प्रोफ़ाइल देखते-देखते अचानक कर दिया ब्लॉक।
वो चाहता तो उसे अनफ्रेंड भी कर सकता था
पर उसने ऐसा नहीं किया
क्योंकि बचा हुआ एक जानता था कि
मरे हुए लोग फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नहीं करते।

(16 ! 03 ! 19)

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देवेन्द्र अहिरवार
छतरपुर ज़िले के 'पहरा' गांव से हूँ, 2012 में मध्यप्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा के पहले बैच से पास आउट, 2017 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से डिज़ाइन और डिरेक्शन से स्नातक लिखता हूँ- स्क्रिप्ट, कविताएं, गाने। गाता हूँ, म्यूज़िक बनाता हूँ मंडी हाउस दा बैंड का फाउंडर हूँ डिज़ाइन और डिरेक्ट करता हूँ इतना कुछ करता हूँ कि कुछ भी ठीक से नहीं कर पाता प्रेम के अलावा दोस्त कहते थे कि 70 MM के पर्दे पर तुम्हारा नाम बहुत अच्छा लगेगा, इसी लिए मुम्बई में हूँ और मैं किताब पर अपना नाम लिखा देखना चाहता हूँ, पर कोई पब्लिकेशन इंटरेस्ट नही दिखा रहा है!

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