वफ़ा के नाम पर
अपने आप को
एक कुत्ता
कहा जा सकता है,
मगर
कुतिया नहीं।
कुतिया शब्द सुनकर ही लगता है
यह एक गाली है।
क्या इसलिए कि वह स्त्री है
उसका चरित्र
उसकी वफ़ा
कई बटखरों में तौली जाती है?

कुत्ता और कुतिया एक-दूसरे के पूरक हैं
चरित्र के नाम
कुत्ता वफ़ादार
और
‘कुतिया’ गाली क्यों बन जाती है?

पुरुष-प्रधान समाज में
समर्पण हो या
विद्रोह
दुर्गुण का दोष स्त्री पर ही
मढ़ा जाता है,
पुरुष के दुर्गुणों पर
मनु-नाम की चादर
ओढ़ा दी जाती है।

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सुशीला टाकभौरे
जन्म: 4 मार्च, 1954, बानापुरा (सिवनी मालवा), जि. होशंगाबाद (म.प्र.)। शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी साहित्य), एम.ए. (अम्बेडकर विचारधारा), बी.एड., पीएच.डी. (हिन्दी साहित्य)। प्रकाशित कृतियाँ: स्वाति बूँद और खारे मोती, यह तुम भी जानो, तुमने उसे कब पहचाना (काव्य संग्रह); हिन्दी साहित्य के इतिहास में नारी, भारतीय नारी: समाज और साहित्य के ऐतिहासिक सन्दर्भों में (विवरण); परिवर्तन जरूरी है (लेख संग्रह); टूटता वहम, अनुभूति के घेरे, संघर्ष (कहानी संग्रह); हमारे हिस्से का सूरज (कविता संग्रह); नंगा सत्य (नाटक); रंग और व्यंग्य (नाटक संग्रह); शिकंजे का दर्द (आत्मकथा); नीला आकाश, तुम्हें बदलना ही होगा (उपन्यास)।

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