मेरे गाँव के धनाराम मेघवाल को जिस उम्र में
जाना चाहिए था स्कूल
करने चाहिए थे बाबा साहब के सपने पूरे
उस उम्र में उसने की थी सत्संग की संगत

सारी रात जागकर सुना-गुना करता सत्संग
दिन-भर भेड़ें चराता
चाय बनाता हुआ
गाता था खेजड़ियों तले बैठकर वाणियाँ

इस बीच उसके मुँह से निकलने वाली टिचकारियाँ
कब ढल गई थीं वाणियों में,
उसके हाथों को
सिवाय रेवड़ घेरने के कुछ नहीं आता
कब थाम लिया था तम्बूरा क्या मालूम!

बारह-सौ घरों के गाँव में ऐसा कोई घर नहीं छोड़ा
जहाँ धनाराम ने सत्संग न की हो

जब वह गला खँखारने के बाद
छेड़ता तम्बूरे के तार
उस वक़्त ऐसा लगता
कि घर की छत पर
औंधे मुँह रखी मटकी पर गिर रही हों बारिश की बूँदें

उसकी मधुर वाणियाँ सुन-सुनकर
हरा हो जाता था समूचा थार
लोक-देवियाँ उसके कण्ठ में से
भरने आती थीं मिठास
और पीने आते थे लोक-देवता बीड़ी, चिलम

फिर भी गाँव के ऊँची बिरादरी के लोग
उसके हाथों का पानी तक नहीं पीते थे

बरसों-बरस गुज़र गए तम्बूरे को गाँव की खूँटी पर टँगे
अब भी कभी-कभार
छेड़ जाती है सावन-भादो की बयार
तम्बूरे के तार!

संदीप निर्भय की कविता 'गाँव को विदा कह देना आसान नहीं है'

संदीप निर्भय का कविता संग्रह ‘धोरे पर खड़ी साँवली लड़की’ यहाँ ख़रीदें:

Previous articleदुःख
Next articleकिताब अंश: ‘पाकिस्तान मेल’ – खुशवंत सिंह
संदीप निर्भय
गाँव- पूनरासर, बीकानेर (राजस्थान) | प्रकाशन- हम लोग (राजस्थान पत्रिका), कादम्बिनी, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, राष्ट्रीय मयूर, अमर उजाला, भारत मंथन, प्रभात केसरी, लीलटांस, राजस्थली, बीणजारो, दैनिक युगपक्ष आदि पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी व राजस्थानी कविताएँ प्रकाशित। हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से 'धोरे पर खड़ी साँवली लड़की' कविता संग्रह आया है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here