गाँधी महतमा

‘Gandhi Mahatama’, a poem by Deepak Jaiswal

मेरी माँ बताती हैं कि
गाँधी देवता आदमी थे
उनके दो पैर, चार आँखें, बारह हाथ थे
और बड़ा सा दिमाग़ भी
उनका दिल मोम का बना था

उनको देखकर अंग्रेज़ थर थर काँपते थे
हवा पीकर बहुत दिन तक वे रह सकते थे
वे नंगे रहते थे
उनके कपड़े अंग्रेज़ चुरा ले गए थे

उनका चश्मा बहुत दूर तक देखता था
बुधिया के आँसू उनके चश्मे पर
जाकर गिरते थे

वे बकरी का दूध पीते थे
सहारे के लिए एक
पतली सी लाठी रखते थे
बच्चों के मानिन्द हँसते थे
उनके पास कई जिन्ह थे
आजादी के बाद
संसद भवन में
बकरीद मनायी गई थी
उनकी बकरी वहीं मारी गयी थी
उनकी लाठी खींचा-तानी में
चौदह अगस्त की रात टूट गयी थी
उसका एक हिस्सा हिंदुस्तान ने लिया
दूसरा हिस्सा पाकिस्तान

उनके जिन्ह
बहुत दिनों से एक पैर पर खड़े थे
अब उन्हें कुर्सी चाहिए थी

मेरी माँ बताती हैं
जब दंगे होने शुरू हुए
वे गलने लगे थे
वे बूढ़े हो गए थे…!

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