जब घर बनाऊँगा
सबसे बाहर के कमरे में
फ़र्श तक फैली खिड़कियाँ होंगी
वहीं बैठकर रास्तों को घूरता रहूँगा
कविताएँ लिखूँगा छोटी-छोटी
कहानियाँ भी
राहगीर होंगे मेरी कहानियों के पात्र
शाम को छत पर बैठूँगा
सूखी पत्तियों का अलाव जलाकर
कच्ची उम्र के तजुर्बे लिखूँगा

कल्पनाओं से सौंदर्य रचूँगा
यूँ भी सुन्दरता
आविष्कार की वस्तु नहीं
कवि ही रचता है
ख़ुद को खुरचकर
अक्षर-अक्षर ख़ूबसूरती

हथेलियाँ रगड़कर
डायरी के पन्नों पर रख दूँगा
लाल नीले और धानी रंग से
तस्वीर बनाऊँगा
तुम्हारी
और नाम लिखूँगा
‘गंगा पार की मोनालिसा’!

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रजनीश गुरू
किस्से कहानियां और कविताएं पढ़ते-पढ़ते .. कई बार हम अनंत यात्राओं पर निकल जाते हैं .. लिखावट की तमाम अशुद्धियों के साथ मेरी कोशिश है कि दो कदम आपके साथ चल सकूं !!

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