‘Gati’, a poem by Niki Pushkar

हृदय-वाहिनी पर
जगह-जगह अपमान के बाँधों ने
मन-तरंग रुद्ध किए
विषाक्त हो रहा था
अन्तस-सरोवर

इस दूषण से
आहत हुए उर-शैवाल,
मरने लगी भावनाओं की मीन,
हिय-तरिणी की रवानी
बंधित होने लगी,
उसे अविरल-गति चाहिए थी
नेह की, विश्वास की, सम्वाद की

वंचना के अवरोध समाप्त होने ही चाहिए
ताकि
जीवंत रहे प्रेम और
जीवित रह सकें
तुम और हम!

Previous articleदोहरी तकलीफ़
Next articleमेरी नींदः रेत की मछली
निकी पुष्कर
Pushkarniki [email protected] काव्य-संग्रह -पुष्कर विशे'श'

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here