‘Gati’, a poem by Niki Pushkar

हृदय-वाहिनी पर
जगह-जगह अपमान के बाँधों ने
मन-तरंग रुद्ध किए
विषाक्त हो रहा था
अन्तस-सरोवर

इस दूषण से
आहत हुए उर-शैवाल,
मरने लगी भावनाओं की मीन,
हिय-तरिणी की रवानी
बंधित होने लगी,
उसे अविरल-गति चाहिए थी
नेह की, विश्वास की, सम्वाद की

वंचना के अवरोध समाप्त होने ही चाहिए
ताकि
जीवंत रहे प्रेम और
जीवित रह सकें
तुम और हम!

निकी पुष्कर
Pushkarniki 123@gmail.com काव्य-संग्रह -पुष्कर विशे'श'