नभ की उस नीली चुप्पी पर
घंटा है एक टंगा सुन्दर,
जो घड़ी-घड़ी मन के भीतर
कुछ कहता रहता बज बज कर।

परियों के बच्चों से प्रियतर,
फैला कोमल ध्वनियों के पर
कानों के भीतर उतर-उतर
घोंसला बनाते उसके स्वर।

भरते वे मन में मधुर रोर
“जागो रे जागो, काम चोर!
डूबे प्रकाश में दिशा-छोर
अब हुआ भोर, अब हुआ भोर!”

“आई सोने की नई प्रात
कुछ नया काम हो, नई बात,
तुम रहो स्वच्छ मन, स्वच्छ गात,
निद्रा छोड़ो, रे गई, रात!

Previous articleइस बार बसन्त के आते ही
Next articleविजय तेंडुलकर का मराठी नाटक ‘गिद्ध’ (गिधाड़े)
सुमित्रानंदन पंत
सुमित्रानंदन पंत (20 मई 1900 - 28 दिसम्बर 1977) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका जन्म कौसानी बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।