‘Ghar’, a poem by Rohit Thakur
कहीं भी घर जोड़ लेंगे हम
बस ऊष्णता बची रहे
घर के कोने में
बची रहे धूप
चावल और आटा बचा रहे
ज़रूरत-भर के लिए
कुछ चिड़ियों का आना-जाना रहे
और
किसी गिलहरी का
तुम्हारे गाल पर कुछ गुलाबी रंग रहे
और
पृथ्वी कुछ हरी रहे
शाम को साथ बाज़ार जाते समय
मेरे जेब में बस कुछ पैसे।
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