‘Ghar’, a poem by Rohit Thakur

कहीं भी घर जोड़ लेंगे हम
बस ऊष्णता बची रहे
घर के कोने में
बची रहे धूप
चावल और आटा बचा रहे
ज़रूरत-भर के लिए

कुछ चिड़ियों का आना-जाना रहे
और
किसी गिलहरी का

तुम्हारे गाल पर कुछ गुलाबी रंग रहे
और
पृथ्वी कुछ हरी रहे
शाम को साथ बाज़ार जाते समय
मेरे जेब में बस कुछ पैसे।

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रोहित ठाकुर
जन्म तिथि - 06/12/1978; शैक्षणिक योग्यता - परा-स्नातक राजनीति विज्ञान; निवास: पटना, बिहार | विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं बया, हंस, वागर्थ, पूर्वग्रह ,दोआबा , तद्भव, कथादेश, आजकल, मधुमती आदि में कविताएँ प्रकाशित | विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों - हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि में कविताएँ प्रकाशित | 50 से अधिक ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित | कविताओं का मराठी और पंजाबी भाषा में अनुवाद प्रकाशित।

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