वैसे तो घर का हर एक हिस्सा खास रहा, लेकिन घर के पिछवाड़े में मैनें अपना बचपन ज्यादा जिया है या यूं कहिये कि वो ज्यादा याद रह गया, मैं घर के भीतर रहने से ज्यादा घर के पिछवाड़े में ही रहा शायद।

पानी भरने के लिए नल घर के पीछे ही था, मैं नल के ताज़े पानी से बेफिकर हो नंगे नहाता और फिर तौलिया लिपटा कर, मां मुझे गोदी में उठाकर घर के भीतर ले आती थी, यही बचपन की स्मृतियों का सबसे सुन्दर हिस्सा है।

घर के पिछवाड़े एक चूल्हा भी बना रखा था बाउजी ने, उन दिनों उस चूल्हे में मक्के की रोटियां सेकीं जाती थी और भरते के लिए बैंगन भी भूंजें जाते थे। जाड़ो में वहीं बैठ कर हाथ भी ताप लेते थे। लेकिन आजकल उस चूल्हे में केवल पानी ही गरम होता है वो भी कभी-कभी.. मक्के की रोटी में जो चूल्हे की राख लग जाती थी उसका स्वाद और भूजें हुए बैंगन की ख़ुश्बू शायद ही मैं कभी भूल पाऊंगा। उस चूल्हे के ताप की छुअन आज भी हथेलियों में महसूस होती है, शायद बचपन में जब हाथ सेकने के बाद मैनें मुट्ठियाँ बन्द करी होंगीं तो थोड़ी सी तपन उसमें भी समा गई होगी।

घर के पिछवाड़े से ही एक अमराई दिखाई देती थी और साथ ही दिखाई देती थी दशहरी आमों की एक पूरी फौज जिस पर मैं किसी भी वक़्त हमला कर देना चाहता था, मैं और मेरे कुछ दोस्त अपनी गर्मियों की दोपहरें इसी फौज पर हमला करने की तिकड़म में बिता दिया करते, घर के पिछवाड़े में ही हमारी बैठकें हुआ करती थीं, यहीं पर इन चुराए हुए आमों की कुछ फांकें सूखने के लिए भी रखी जाती और हम इन पर भी हाथ साफ जरूर करते, इन्हीं से बनता या तो मुरब्बा या तो आचार!

सुबह की पहली धूप और शाम की पहली छांव घर के पिछवाड़े ही पहले आती, सुबह का सूरज रोज़ सुबह घर के पिछवाड़े से ही घर में घुसता और रोज़ शाम, शाम को अपने साथ लेकर ही वापस निकलता।

एक खेत भी दिखाई देता था यहीं से, जिसमें खूब सारी तुअर लगा करती थी, और तीन चार बकरियों की मिमियाहट भी अच्छे से सुनी जा सकती थी। कभी-कभी गायों के गले की घण्टियों की भी जुगलबन्दी हो जाती थी।

घर के पिछवाड़े से ही एक लंबा-चौड़ा, भरा-पूरा पहाड़ भी दिखता था, मैं चाहता था कि किसी दिन घर के पिछवाड़े की बाउंड्री वाल को फांद कर उस पहाड़ पर चले जाऊँ और दिन भर में उसकी लंबाई-चौड़ाई माप कर शाम तक घर वापस आ जाऊँ, पर मेरे हाथ और पांव छोटे थे तो न मैं दीवार के सिरे तक पहुंच पाता, न ही छलांग लगा पाता, सोचता था जब बड़ा हो जाऊंगा तब जाऊँगा..

मगर अब घर में घर का पिछवाड़ा नहीं रहता, उसके अगल-बगल, आगे और पीछे दीवारें तना दी गईं हैं, अब घर के पिछवाड़े से दिखती हैं केवल दीवार, और इन दीवारों में दबा हुआ है, हर सुबह का सूरज, पहली धूप, एक पूरा खेत, जानवरों की घण्टियों की आवाज़, पूरी की पूरी अमराई, दशहरी आम, एक बड़ा सा पहाड़, एक चूल्हा और दो रोटियां, एक मैं, बचपन का मैं..

और मैं आज भी इतना बड़ा नहीं हुआ कि इन दीवारों को फांद कर उस पहाड़ पर जा सकूँ!

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मुदित श्रीवास्तव
मुदित श्रीवास्तव भोपाल में रहते हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और कॉलेज में सहायक प्राध्यापक भी रहे हैं। साहित्य से लगाव के कारण बाल पत्रिका ‘इकतारा’ से जुड़े हैं और अभी द्विमासी पत्रिका ‘साइकिल’ के लिये कहानियाँ भी लिखते हैं। इसके अलावा मुदित को फोटोग्राफी और रंगमंच में रुचि है।

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