‘Ghar Pahunchna’, a poem by Kunwar Narayan

हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़कर
अपने-अपने घर पहुँचना चाहते

हम सब ट्रेनें बदलने की
झंझटों से बचना चाहते

हम सब चाहते एक चरम यात्रा
और एक परम धाम

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुःखद हैं
और घर उनसे मुक्ति

सच्चाई यूँ भी हो सकती है
कि यात्रा एक अवसर हो
और घर एक सम्भावना

ट्रेनें बदलना
विचार बदलने की तरह हो
और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों
वही हो
घर पहुँचना!

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