घाट

‘Ghat’, a poem by Vishal Andhare

घाट पर मुर्दे को देख
न जाने कितनी आँखों में
उतर आए थे लालच के पंख

पंडित के मंत्र
तेल, बाती, कुमकुम,
लकड़ी, बाल कटाई
कितने बीज परम्परा के
सब के सब आस लगा
निगलने को धर्म की आड़ में
अपनी दुकान चलाते लोग भरे पड़े हैं दुनिया में

छोटा बच्चा गुम था
और सूख गये थे औरत के नयन
बाल ही नहीं कट रहे रहे थे उसके
बल्कि कट गया था वह हाथ जिसे थामकर
धरती पर पहला क़दम रखा था

मंत्र की आवाज से वापस आ पहुँचा
अपनी इस दुनिया में
हवन और दिये का सामान
देख मन में सोचता रहा

इतना सामान तो बापू
ज़िन्दगी भर न लाया अपने घर में
तेल की धार, कपूर, ऊँचे चावल
और भी बहुत कुछ

कुछ ही पल में ये सब हवा हो जायेगा
पंडित के उस मंत्र की तरह
इसी ख़याल में था वो मासूम सा बच्चा

घर में बचा वो
आख़िरी सोने का टुकड़ा
जो बाप के मुँह में डाला था
आग की लपटो में जल ना पायेगा

जब सिर फटकर बाप की देह से निकल आत्मा
संसार में विलीन हो जायेगी
तब वो
अपनी होशियारी से
उस सोने के टुकड़े को निकाल
मरने के सारे रीति रिवाजों को
तोड़ डालेगा

इसी सोच में था, वो
तभी आधी जली लाश को
घाट से नदी में फेंक
उन्हीं लकड़ियों पर सज उठी थी दूसरी लाश
और पंडित अपनी दक्षिणा
की कमी से नाराज़
बड़बड़ाता निकल गया था
अपने उस दूसरे ग्राहक के पास

और आधी जली लाश
गहरे पानी में उतर गयी थी
फिर रातभर आते रहे कितने सारे ख़्वाब
उस बच्चे के मन में

जिसमें उसने लगाई थी एक छलांग उस पानी में
और मिल ही गया था
उसे वो सोने का टुकड़ा
जिसके बूते वो देखता रहा रातभर
क़र्ज़ के कुछ टुकड़े
कम करने के ख़्वाब

कल से उसके सर पर उग आएँगे नये बाल
और उन्ही के संग उगेंगे क़र्ज़ के बीज भी
जो बढ़तें रहेगे उसकी
छोटी सी दुनिया के सिर पर!

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