आलोक मिश्रा की ग़ज़लें

1

तो क्या हुआ जो तमाशाई हो गया हूँ मैं
तिरे ही हक़ में तो सब झूठ बोलता हूँ मैं

नहीं ये दुःख तो किसी और के सबब है अब
तुम्हें तो दिल से रिहाई भी दे चुका हूँ मैं

डरूँ मैं क्यों न भला तेरी ग़म-गुसारी से
कि इसके बाद के सब मोड़ जानता हूँ मैं

ये पूछना था कि मेरी भी कुछ जगह है कहीं?
तुम्हारे दर पे खड़ा सर्द पड़ रहा हूँ मैं

मुझे पता है कि रोने से कुछ नहीं होता
नया सा दुःख है तो थोड़ा छलक गया हूँ मैं

सहा न जाता था वां फ़ासले से रहना सो
बिछड़ के तुझसे तेरे साथ हो लिया हूँ मैं

2

लुत्फ़ आने लगा बिखरने में
एक ग़म को हज़ार करने में

बस ज़रा सा फिसल गए थे हम
इक बगुले पे पाँव धरने में

कितनी आँखों से भर गई आँखें
तेरे ख़्वाबों से फिर गुज़रने में

बुझते जाते हैं मेरे लोग सभी
रोशनी को बहाल करने में

मैंने सोचा मदद करोगे तुम
कमनसीबी के घाव भरने में

किस क़दर हाथ हो गए ज़ख़्मी
ख़ुदकुशी तेरे पर कतरने में

3

तुम्हारे साए से उकता गया हूँ
मैं अपनी धूप वापस चाहता हूँ

कहो कुछ तो ज़बां से बात क्या है
मैं क्या फिर से अकेला हो गया हूँ?

मगर ये सब मुझे कहना नहीं था
न जाने क्यों मैं ये सब कह रहा हूँ

सबब कुछ भी नहीं अफ़सुर्दगी का
मैं बस ख़ुश रहते-रहते थक गया हूँ

गिला करता नहीं अब मौसमों से
मैं इन पेड़ों के जैसा हो गया हूँ!

यह भी पढ़ें: ‘उसे मैसेज तो भेजा है कि कॉफ़ी पर मिलो मुझ से’

Recommended Book: