चाहे संकीर्ण कहो या पूर्वाग्रही
मैं जिस टीस को बरसों-बरस
सहता रहा हूँ
अपनी त्वचा पर
सुई की चुभन जैसे,
उसका स्वाद एक बार चखकर देखो
हिल जाएगा पाँव तले ज़मीन का टुकड़ा।

मेरे और तुम्हारे बीच एक रेतीला ढूह है
जो किसी अंधड़ का इंतज़ार करने से पहले
किसी भी वक़्त फट सकता है
जिसके गर्भ से निकलेंगे
घृणा में लिपटे कुटिल शब्द
जिन्हें जलना होगा
दहकती भट्ठी में
रोटी की महक में बदलने के लिए।

रोटी की महक
जानती है आग का स्वाद
और,
पहुँचती है नासिका रन्ध्र तक
हड्डियों के रस में डूबकर।

यदि, तुम्हें पहुँचना है
इस महक तक
अपने कापुरुष से कहो
भय छोड़कर बाहर आए
जैसे छत पर आती है धूप।

घृणा तुम्हें मार सकती है
तोड़ सकती है
पर अपने ही दायरे में,
ज़िंदा नहीं रख सकती
ताज़ा हवा देकर
और, नहीं सुना सकती
प्रेम कविता
मौसम के रंगीन पंखों पर बैठकर!

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता 'शम्बूक का कटा सिर'

Book by Omprakash Valmiki: