‘Giddh’, a poem by Deepak Kumar

लड़कियों के पैदा होते ही
खड़ी कर दी जाती है एक लम्बी दीवार
दीवार जिसपे छपे हैं
धर्म, जाति, इज़्ज़त, मर्यादा, सम्मान और पाखण्ड के इश्तिहार
लड़कियाँ इश्तिहार पढ़ते हुए बड़ी होती हैं
और पूछती हैं माँ से इन इश्तिहारों के मायने
माँ उत्तर में केवल
‘मौत’ कहकर रो देती है

माँ जानती है दीवार के पार की दुनिया
मगर लड़कियों को सुनाती है झूठी कहानी गिद्धों की

गिद्धों से डरते-डरते
एक दिन लड़कियाँ देखने लग जाती हैं स्वप्न गिद्धों की
गिद्ध सपनों में लड़कियों को
देता है लाल गुलाब

लड़कियाँ अब जानती हैं
डर गिद्ध से नहीं, लाल गुलाब से है…!

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दीपक सिंह
कवि और लेखक। विभिन्न प्लेटफॉर्म पर कविताएँ एवं लघु प्रेम कहानियाँ प्रकाशित। बिहार के कोसी प्रभावित गाँवों में सामाजिक और आर्थिक रूप से शोषित लोगों के लिए अपनी सेवा में कार्यरत।

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