गोधूलि की दीवाली

‘Godhuli Ki Diwali’, Hindi Kavita by Anupama Jha

सुनो
दीवाली की सफ़ाई कर लो
हाँ करनी है अबकी, जमकर।
सबसे पहले
खूँटी पर टँगी
वो पोटली फेंकूँगी
जिसमें मेरी कितनी अनचाही
‘हाँ’ बँधी हैं।
हाँ वही कोने वाली
खूँटी पर टँगी पोटली!

हर बात में हाँ करके
देखो न, कितनी
हाँ इकट्टी हो रखी हैं!
फ़ुज़ूल, बेदिल, बेमानी वाली।
अब से कुछ अपनी पसंद की
हाँ इकट्ठी करूँगी
और रखूँगी सजाकर
जहाँ से दिखायी दे
सबको मेरी ‘हाँ’
अपनी ख़्वाहिशों को नहीं छुपाऊँगी
किसी अख़बार या अलमारी में
सबसे नीचे,
क़रीने से सजाऊँगी
बैठक वाली अलमारी में
रखूँगी सबके बीच।
अबकी दीवाली बहुत कुछ करना है
बरसों से परत दर परत
जमी औरों की सोच को
‘सेल्फ थिंकिंग’ वाले
लोशन से साफ़ करना है।

सोच रही हूँ
‘लोग क्या कहेंगे’ वाला
पोस्टर भी घर से निकाल दूँ।
बहुत साल देख लिया इसे।

वो जो मेरी ज़ोर से हँसने वाली
आदत बन्द पड़ी न, घर में कहीं
उसे ज़रा बाहर निकाल लूँ।
अब भी वैसे ही चमकती है,
बिल्कुल नयी जैसी।
क्यूँ न उसे ही दिवार पर टाँग दूँ?
बहुत कुछ करना है
उम्र की गोधूलि हो चली है,
जो भी बची साँझ है
उनमें क्यूँ न ख़्वाहिशों की अवलि लगा लूँ?
प्रज्ज्वलित कर उन्हें
अपने मन की दीवाली मना लूँ?

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