तुम्हें दुःख पहुँचाया तो
होगी वह मेरी ही हार
कहा था तुमने
किन्हीं आकुल पलों में,
और
झट से अपने दुःखों का हलाहल
पी गई मैं

तुम सदा गौरवान्वित रहें
अपनी जीत के भ्रम में
और मुस्कुराकर
अपनी हार का उत्सव
मनाती रही मैं

मेरी मुस्कराहट को भाँपना
तुम्हारे बस की बात नहीं
और तुम हारे हुए महसूस ना करो
यह मेरी ज़िद थी अडिग

हर हाल में ठगे गए हम
मनाते रहे अपनी जीत का जश्न
और
प्रेम खड़ा था
कुछ ही दूरी पर
किसी हार-जीत से परे।

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