आज हम हड़ताल पर हैं।
हड्डियों से जो चिपककर रह गई, उस खाल पर हैं।

यह ख़बर सबको सुना दो
इश्तहारों में लगा दो
हम लड़ाई पर खड़े हैं
ठोस मुद्दों पर अड़े हैं
तुल गए हैं जेल भरने के लिए, इस हाल पर हैं।

आज हम हड़ताल पर हैं।

अब न ये जत्थे रुकेंगे
अब न ये बैनर झुकेंगे
हर सिपाही जोश में है
और पूरे होश में है
किन्तु जो ख़ामोश हैं, उनके लिए, भूचाल पर हैं।

आज हम हड़ताल पर हैं।

आग ये आसमान की है
आन की है, बान की है
आग ये ईमान की है
हर दुःखी इंसान की है
मुट्ठियों की आग के तेवर, हमारे भाल पर हैं।

आज हम हड़ताल पर हैं।
हड्डियों से जो चिपककर रह गई, उस खाल पर हैं।

शैलेन्द्र की कविता 'हर ज़ोर-ज़ुल्म की टक्कर में'

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रमेश रंजक
(12 सितम्बर 1938 - 8 अप्रैल 1991)प्रसिद्ध कवि-नवगीतकार।

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