Haikus: Dilip Sharma Bhardwaj

1

घटाएँ घिरीं
वर्षा बिखर गयी
तू याद आया

2

गुलाब देखा
सूख गये वो लफ़्ज़
मन था नम

3

दिन वो बीते
फिरता रहा तन
अकेलापन

4

लिखते गए
विधाएँ ही प्रेम की
उभरे ज़ख़्म

5

खेलते रहे
खामोशी से मैं तुम
व्यथित मन

6

घर घर में
होते से गये जुदा
खिंची दीवारें

7

ऊँचे पर्वत
ख़ामोश औ’ सख़्त ही
टूटते नहीं

8

सीखा हवा से
बवण्डर ले आती
ख़ामोशी में भी

9

बहते रहो
नदियों की तरह
बढ़ते चलो

10

मैं और तुम
सर्द हवाएँ बहीं
चाँद मुस्काया।

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भारद्वाज दिलीप
भारद्वाज दिलीप भरतपुर (राजस्थान) पब्लिकेशन कम्पनी में कार्यरत 1999 ग्रेजुशन हिन्दी से अंत में "आप थक न जाये हार कर आप समय निकाले और पाठक बने रहे!" भारद्वाज दिलीप

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