हर बार
कुछ ना कुछ
रह जाता है – लिखने को
हर बार
कुछ ना कुछ
चूक जाता है – नज़र से
हर बार
कुछ ना कुछ
भूल जाता हूँ – सब कुछ बोल जाने की हड़बड़ी में
हर बार
कुछ ना कुछ
सुन नहीं पाता – तुम्हें बोलता हुआ देखने में
हर बार
थोड़ा सा मैं
छूट जाता हूँ – घर पर
तुमसे मिलने की छटपटाहट में
हर बार
कुछ अपने से ज़्यादा ही
पहुँच जाता हूँ
पास तुम्हारे
हर बार
एक नई और अलग भाषा
बोलती हैं – मेरी निगाहें
और मुझसे पहले ही
सब कुछ
कह देती हैं – धड़कनें
हर बार
थिरकता हुआ पाया है – समय को
तेज़ी से फिसलता
और ख़ुद को पाया है – सुसभ्य, सुसंकृत और अहिस्ता

हर बार
जब सब कुछ हो चुका होगा
और इस सब कुछ के हो चुके होने में
फिर भी बहुत कुछ बाकी रह जायेगा
कहने-सुनने को
लिखने-पढ़ने को
समझने को
हर बार की तरह – मैं पुनः बाकी रह जाऊँगा
ख़ुदको तुमसे भरने की कोशिश में।

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