‘हरी घास पर क्षण भर’ : अज्ञेय

गेटे ने एक जगह लिखा है कि “आजकल के कवि अपनी स्याही में बहुत-सा पानी डाल देते हैं।”

और आधुनिक हिन्दी कविता में तो वह पानी या तो आँसुओं का होता है या ‘काग़ज़ी क्रान्ति की शाब्दिक सिपाहीगिरी’ के आक्रोश के पसीने का। ‘अज्ञेय’ हिन्दी के आधुनिक कवियों में उनमें से हैं जिन्होंने जो कुछ लिखा है, वह अनुभूति की गहराई के प्रति प्रामाणिक होकर, किसी प्रकार के बाह्य आग्रह के वशीभूत होकर नहीं, चाहे वह श्रोतृ-पक्ष का हो या पाठक-वर्ग का। इसी कारण से उनकी काव्य-कला में एक प्रकार की निरन्तर खोज विद्यमान है।

इस संग्रह में आकर उनकी कविता हरी घास पर क्षण-भर रुक गयी है—शबनम की तरह नहीं कि जो दूसरे क्षण में ढुलक जाएगी, बल्कि ‘अतीत के शरणार्थी’ की भाँति ‘जीवन के अनुभव का प्रत्यवलोकन‘ करने, आत्ममन्थन-रत होकर। इस संग्रह की सबसे सुन्दर और लम्बी कविता इसी नाम से है—’हरी घास पर क्षण भर’। दूसरी उतनी ही शक्तिमयी कविता है—’नदी के द्वीप’। दोनों में कवि अपने व्यक्तिवाद की एक नयी व्यंजना करता है। वह शहराती तथाकथित सभ्यता से ऊबा हुआ है।

वह बनावटी उपनामों का, घिसी-घिसायी अलंकार-नियोजना का क़ायल नहीं; वह अनुभव करता है कि सुख का आविष्कार मानव के प्रत्येक अहम् में सामाजिक अभिव्यक्ति पा चुका है; अब केवल मौन ही नयी कहानी कह सकता है।

इसी अर्थ में ‘क्षण-भर’ शब्द को महत्ता है; अभी तो हम धारा नहीं है, द्वीप हैं, धारा ने हमारा आकार गढ़ा है—परन्तु बाढ़ आने पर क्या होगा? होने दो, जो होगा सो होगा। डी० एच० लॉरेन्स ने तीस वर्ष पूर्व अपनी नयी कविताओं की भूमिका में इसी प्रकार लिखा था—

“आरम्भ की और अन्त की कविता में चाहे पूर्णता हो, हमारी कविता तो निकटतम वर्तमान की है। इसी क्षण की, अभी की। जीवन इसी प्रकार से चिर-वर्तमान है, वह अन्त नहीं जानता!”

इस प्रकार से अज्ञेय की कविता में इम्प्रेशनिस्ट चित्रकारों का-सा क्षणचित्रण प्रधान है। इसी से उसकी अनुभूति में अन्तर्निहित मूक व्यथा, एक घुटा-सा दर्द, कुण्ठित पीड़ा होने पर भी वह भावुकता का प्रदर्शन नहीं करता; उसकी स्याही में आँसुओं का पानी नहीं है। उसकी करुणा प्रगाढ़ है। ‘वह हरहराते ज्वार-सा बढ़ सदा आया एक हाहाकार’ है। उसमें परिताप की जलन है, अतृप्ति का निरा धुंधुवाना नहीं। इसी आत्मविश्वास से वह लिखता है—

समर्पण लय, कर्म है संगीत;
टेक करुणा—सजग मानव प्रीति!

कुल मिलाकर यह संग्रह स्मृतियों का एक अलबम-सा है, जिसमें के कुछ चित्रों पर के रंग उड़ गए हैं; कुछ चित्र फीके पड़ गए हैं। कुछ खण्डित हो गए हैं; और उस भग्नावशेष की दीवारों से उठती एकाकी गुहार की अनुगूँज वहाँ के अवकाश में समा गयी है। प्रत्यभिज्ञा सदा ही मधुर नहीं होती। और कहीं-कहीं हरी घास में से भी सूखी घास झलकती है, जैसे ‘एक ऑटोग्राफ़’, ‘शरद की तुकें’ (पृ० 36), ‘कवि’, ‘हुआ क्या फिर’, ‘पुनराविष्कार’ आदि। ‘सवेरे-सवेरे’, ‘और दीखती है दीठ’ आदि कविताओं में वही ‘शिशिर की एका निशा’ वाली कड़वाहट है। कहीं-कहीं हठाकृष्ट रचना भी है, मानो प्रयोग कहीं लड़खड़ा गया हो। कहीं दुरूहता घनी हो उठती है।

परन्तु इन दोषों के बाद भी इस संग्रह में हरापन है। ‘ओ रे आमार सबूज, ओ रे आमार काँचा’ कहकर रवीन्द्र ने और ह्विटमैन ने ‘लीव्ज़ ऑव ग्रास’ में ‘हिलते हुए हरे-हरे छोटे रूमालों से धरित्री मानो बादलों को बुला रही है’ कहकर इस दूब को याद किया था। भूमिका में कुछ अतिरिक्त निकटता से कवि ने ‘संसार में उद्यानों की कमी के कारण जहाँ-तहाँ बची हरी घास की थिठालियों को भी उजाड़ फेंकना’ चाहनेवालों के कुण्ठित अकरुण मन को व्यर्थ ही कोसा है। वस्तुतः कवि का मन स्वयं उद्यान-प्रिय जान पड़ता है उसकी अलंकृता रचना से। पहले का वन्य ‘भग्नदूत’ अब आकर बहने से डरता है— ‘पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे।’ क्योंकि उसकी चेतना ठिठककर द्वीपरूपिणी बन गयी है। यायावरत्व का मोह भी ऐसी ही एक प्रतीप ईहा है। परन्तु हम चाहते हैं ‘अज्ञेय’ जो कि आधुनिक हिन्दी कविता को अन्तर्राष्ट्रीय रूखी गद्यप्राय वर्तमान कविता की धारा से जोड़नेवाली एक स्रोतस्विनी हैं, द्वीप न बन जाएँ। और फ़ेदेरिको गाशिया लोर्काकी भाँति वे कहें— हरा—मैं तुम्हें हरा चाहता हूँ।

हरी हवा। हरी शाखें।
समुद्र पर जहाज
और पर्वतों में घोड़ा!