हीन भएँ जल मीन अधीन

हीन भएँ जल मीन अधीन, कहा कछु मो अकुलानि-समानै।
नीर-सनेही कों लाय कलक निरास ह्वै कायर त्यागत प्रानै॥
प्रीति की रीति सु क्यों समुझै, जड़ मीत के पानैं परे कों प्रमानै।
या मन की जु दसा घनआनँद जीव की जीवन जान ही जानै॥

प्रस्तुत सवैया में कवि अपने प्रेम की तुलना में मीन के जल-प्रेम को हीन कोटि का बताता हुआ कहता है कि-

मछली जल से हीन (अलग) होने पर मरने को विवश हो जाती है। अतः उसकी प्रिय-विछोह की विकलता मेरे हृदय की आकुलता की क्या कुछ थोड़ी सी भी समता कर सकती है? अर्थात नहीं कर सकती है। क्योंकि मछली अपने प्रेमी जल को कलंक लगाकर (क्योंकि लोग कहते हैं जल के वियोग के कारण वह प्राण त्याग देती है और प्रतिदान में जल कुछ नहीं करता) तथा स्वयं जल से वियुक्त होने पर जीवन के प्रति आशा रहित हो संसार के कष्टों को सहन करने में असमर्थ की भाँति अथवा कायर बनकर प्राणों का त्याग कर देती है। और अपने इस प्रकार के कार्यों से वह अपने प्रिय अचेतन जल (जड़) के हाथ में पड़ने को प्रमाणित करती है। क्योंकि (जड़) जल के वश में पड़ने से ही उसकी उदासीनता के कारण मछली मर जाती है। और इस प्रकार विचार करने पर निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वह (मछली) प्रेम की प्रणाली को भली भाँति कैसे जान सकती है, अर्थात् नहीं जान सकती है। परन्तु उनका सुजान के प्रति जो स्नेह है उसके लिए घनानंदजी का विश्वास है कि वियोग की दशा में उनके मन की जो अवस्था है उसे उनके प्राणों की भी प्राण सुजान भली भाँति जानती होगी।

इस पूरे सवैया में घनानंद जी सुजान के प्रति अपने प्रेम को जल के प्रति मछली के प्रेम से श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैं; क्योंकि उनकी दृष्टि से मछली का प्रेम-भाजन जल जड़ है और मछली में जल के वियोग को सहन करने की शक्ति का पूर्ण अभाव है। उनके विचार से उनके प्रेम की तुलना मीन के प्रेम से इसलिए और भी नहीं की जा सकती है कि उनकी प्रेमिका जड़ न होकर चेतन है और वे स्वयं वियोग की मर्मांतक पीड़ा सहने में समर्थ हैं। जड़ को न सही चेतन को तो प्रभावित किया ही जा सकता है। फिर दोनों की स्नेह में समता क्या?

***