हिमा! तुम्हारे पाँव

‘Hima! Tumhare Paanv’, a poem for Hima Das by Shweta Rai

ऊर्जा से भरे नील गाय के पाँव
जैसे तुम्हारे पाँव
जानते हैं उस गति को
जिस गति से प्रकाश भेदता है अँधेरे को…

और यह भेदना
स्थापित करता है उस मान्यता को कि
होते हैं गुदड़ी में लाल भी…

रात दिन के चक्र की तरह भागते तुम्हारे पाँव
देते हैं जीवन को द्युति की चमक
और तुम चपला की तरह चमकती हो उस परिवेश में
जहाँ भागना कर्म नहीं कृत्य है….

असमानता की बारिश में
तुम्हारे पाँव जानते हैं करना अथक परिक्रमा सूर्य की

और तुम्हारे देह से झरती
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र की बूँदें
जानती हैं भर देना उन भगौलिक विषमताओं की कन्दराओं को
जहाँ की धरती पर टिका कर तुम अपनी उँगलियों को
उगाती हो धूप चाँदनी के पंख अपने पाँव में
जिसपर सवार तुम्हारे सपने
देते हैं तूफ़ानी गति तुम्हारी अभिलाषाओं को

जिससे बदल जाता है तुम्हारी आँखों का मौसम

धरती लेती है करवट
टूट जाती हैं कई भ्रांतियाँ
सहज रूप धर आती हैं क्रांतियाँ
खुल जाते हैं बंद मन के दृढ़ कपाट
और सन्नाटे में बज उठती हैं देवालय की असंख्य घण्टियाँ

जिनके शोर में तुम नाप आती हो पूरा ब्रह्माण्ड अपने पाँव से…

बधाई हो लड़की!

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