यही तो घर नहीं और भी रहता हूँ

जहाँ-जहाँ जाता हूँ, रह जाता हूँ
जहाँ-जहाँ से आता हूँ, कुछ रहना छोड़ आता हूँ
जहाँ सदेह गया नहीं
वहाँ की याद आती है
याद में जैसे रह लेता हूँ
तो थोड़ा-सा रहने का स्पर्श
वहाँ भी रह जाता है

जो कुछ भी है जितना भी
नहीं भी जो है जितना भी
वहाँ-वहाँ उतना-उतना रहने की इच्छा से
एक धुन निकलती है
इस धुन में घुल जाता हूँ
होने की सुगन्ध के साथ।

प्रभात की कविता 'अधिक प्रिय वजह'

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