‘Honth’, a poem by Kedarnath Singh

हर सुबह
होंठों को चाहिए कोई एक नाम
यानी एक ख़ूब लाल और गाढ़ा-सा शहद
जो सिर्फ़ मनुष्य की देह से टपकता है

कई बार
देह से अलग
जीना चाहते हैं होंठ
वे थरथराना-छटपटाना चाहते हैं
देह से अलग
फिर यह जानकर
कि यह सम्भव नहीं
वे पी लेते हैं अपना सारा ग़ुस्सा
और गुनगुनाने लगते हैं
अपनी जगह

कई बार सलाखों के पीछे
एक आवाज़
एक हथेली
या सिर्फ़ एक देहरी के लिए
तरसते हुए होंठ
धीरे-धीरे हो जाते हैं
पत्थर की तरह सख़्त
और पत्थर के भी होंठ होते हैं
बालू के भी
राख के भी
पृथ्वी तो यहाँ से वहाँ तक
होंठ ही होंठ है

चाहे जैसे भी हो
होंठों को हर शाम चाहिए ही चाहिए
एक जलता हुआ सच
जिसमें हज़ारों-हज़ार झूठ
जगमगा रहे हों

होंठों को बहुत कुछ चाहिए
उन्हें चाहिए ‘हाँ’ का नमक
और ‘ना’ का लोहा
और कई बार दोनों
एक ही समय

पर असल में
अपना हर बयान दे चुकने के बाद
होंठों को चाहिए
सिर्फ़ दो होंठ
जलते हुए
खुलते हुए
बोलते हुए होंठ!

यह भी पढ़ें: केदारनाथ सिंह की कविता ‘एक पारिवारिक प्रश्न’

Author’s Book:

Previous articleअनुवाद
Next articleपानी की तरह इज़्ज़त
केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह (७ जुलाई १९३४ – १९ मार्च २०१८), हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष २०१३ का ४९वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के १०वें लेखक थे।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here