भीड़ में चलते रहे
पहचान अपनी खो दिए
झुंड बढ़ता जिस तरफ़
हम भी उधर ही हो लिए
निराश्रित हो गयी मनुजता
आश्रय की चाह में
विकल धरा भी हो गयी
उसकी सदय आवाज़ से
पर याद रखना पूर्णता
भीड़ से मिलती नहीं
नृशंसता की राह पर
मनुष्यता चलती नहीं
पर हाय इस भीड़ का हिस्सा बने
हम एकाकी लोग हैं…

कुछ आँखों की नींदें छीन लीं
अपने स्वप्न के लिए
क्षणिक ख़ुशी की आड़ ले
औरों को हम घायल किये
और इसे उपलब्धि माना
आत्ममुग्ध हम हो लिए
टूटे स्वप्नों की किरचियों पर
चलते हुए
हम लहूलुहान लोग हैं…

लालसाएं दिल में हर पल
फूलती फलती रहीं
ध्वस्त कर हमको सदा
ख़ुद आप भी जलती रहीं
कृत्य को बिसार कर
अकृत्य ही हमने किया
और ये समझा कि अब
सर्वस्व हमने पा लिया
स्वयं को जीते न जब तक
फिर तो इतना जान लो
विश्व विजय करके भी हम
हारे हुए लोग हैं…

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