‘Hum Laut Aaenge Ek Din’, a poem by Sumit Chaudhary

लौट जाओ
अपने घरों को
लग जाओ चूल्हे-चौके में
पाल लो भेड़, बकरियाँ और गाय
बंद कर दो विश्वविद्यालयों को
और बना दो देश को विश्वगुरु
जिससे बचा रहे
तुम्हारे देश का मान मर्दन होने से

हमारे लिखने-पढ़ने से
तुम्हारे आताताईपन का भेद खुल जाता है
तुम्हारे कर्मकांडी ज्ञान धराशायी हो जाते हैं
तुम तिलमिला जाते हो क़लम की ताक़त से
और शुरू कर देते हो अपने दोगले चरित्र का राग
धीरे-धीरे चल देते हो दीमक जैसे
तब्दील कर देते हो मलवे में हमारे सपनों को

तुम्हारे ज्ञान का गढ़ कितना अछूत है
उसमें नहीं हो सकता हमारे व्यक्तित्व का विकास
हम नहीं बधकर लेना चाहते तुम्हारा ज्ञान
हम होना चाहते हैं घुमक्कड़
जिससे देखी जा सके दुनिया की तमाम सभ्यताएँ
जिसके-जिसके मुहाने पर क़तर दी गई हों ज्ञान की शाखाएँ

तुम मुट्ठी भर लोग
धूर्त और अत्याचारी हो
तुम जिस संस्कृति को जन रहे हो
हम उससे विलग होकर
पूरे हुजूम के साथ
लौट आएँगे एक दिन
अपने चौके, चूल्हे, भेड़, बकरियों और गायों के साथ
क़ब्ज़ा कर लेंगे विश्वविद्यालयों पर
तुम्हारी लाख कोशिशों के बावजूद भी
जिससे किया जा सके तुम्हारे मंसूबों का मर्दन।

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सुमित चौधरी
शोधार्थी-भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।

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