हम सब लौट रहे हैं
ख़ाली हाथ
भय और दुःख के साथ लौट रहे हैं
हमारे दिलो-दिमाग़ में
गहरे भाव हैं पराजय के
इत्मीनान से आते समय
अपने कमरे को भी नहीं देखा
बिस्तर के सिरहाने तुम्हारी
बड़ी आँखों वाली एक फ़ोटो पड़ी थी
बन्द अन्धेरे कमरे में अब भी टँगी होगी
रोटी के लिए फिरते हमारे जैसे लोग
थके और बेबस मन लौट रहे हैं
महीने का हिसाब अभी बक़ाया था
हम सब बिना मज़दूरी के लौट रहे हैं
हिम्मत अब टूट गई है
सर पर जो महाजनों का क़र्ज़ है
उसे बिना चुकाए घर लौटना
मरने जैसा है
हम सब मरे हुए लोग घर लौट रहे हैं
साथ के कुछ लोग भूखे पेट रास्ते में खप गए
एक आदमी का बच्चा रास्ते में मर गया रेल में
ग़रीब आदमी इसी तरह घर लौटता है!

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रोहित ठाकुर
जन्म तिथि - 06/12/1978; शैक्षणिक योग्यता - परा-स्नातक राजनीति विज्ञान; निवास: पटना, बिहार | विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं बया, हंस, वागर्थ, पूर्वग्रह ,दोआबा , तद्भव, कथादेश, आजकल, मधुमती आदि में कविताएँ प्रकाशित | विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों - हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि में कविताएँ प्रकाशित | 50 से अधिक ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित | कविताओं का मराठी और पंजाबी भाषा में अनुवाद प्रकाशित।