हमें नदियों को बचाना है

‘Humein Nadiyon Ko Bachana Hai’, a poem by Pallavi Vinod

वो नहीं जतातीं अपना ग़ुस्सा, अपना क्षोभ
वो तुम्हारी किसी बात से इंकार नहीं करती हैं;
वो हर किसी पर झुँझलातीं, नाराज़गी जतातीं
तुम्हारी हर बात एक सिरे से काट देती हैं।

वो तुम्हारी हर हरकत पर मुस्कुरा कर शांत रहती हैं
तुम्हारे घर के हर कोने को चमकाने में लगी रहती हैं;
उन्हें तुम्हारी किसी भी हरकत पर मुस्कुराना नहीं आता
उन्होंने तुम्हारे घर को सजाना छोड़ दिया है।

वो तीनों पहर दिया-बाती करतीं, दुआएँ पढ़ती रहती हैं
व्रत उपवास ने उन्हें कमज़ोर कर दिया है;
वो ईश्वर से रूठी हुई हैं
उपवास के दिनों में बेतहाशा खाती हैं।

उनकी ज़िन्दगी की धुरी सिर्फ़ उनके बच्चे हैं
बच्चों के ख़ाली कमरों में बैठी आँसू बहाती हैं;
उन्होंने बच्चों को ख़ुद से मुक्त कर दिया है
उनके कमरों से आती आवाज़ों से बचकर निकल आती हैं।

ये औरतें दिन-प्रतिदिन सादी होती जा रही हैं
अपने पसंद के कपड़ों को बक्सों में बंद कर
उनकी चाबियाँ भूल गयी हैं;
ये औरतें दिन-प्रतिदिन जवान हो रही हैं
अति नवीन परिधानों में उघड़ी, मेकअप की परतों में दबी
नकली हँसी का मुखौटा लगाए जाने क्या छिपा रही हैं।

देखना, इन दोनों में से कोई एक तुम्हारे घर में तो नहीं है?

बिन बात पर ठहाके लगातीं या हँसने वाली बात पर भी
काम भर मुस्कुराती ये औरतें
अपना किरदार निभाते-निभाते थक गई हैं।
कभी उनकी आँखों में झाँकना
ये सूख चुकी उदास नदियाँ हैं…

हमें इन नदियों को बचाना है।

यह भी पढ़ें: ‘पुरुष अभिशप्त है’

Recommended Book: