इराक़ी-अमेरिकी कवयित्री दुन्या मिखाइल का जन्म बग़दाद में हुआ था और उन्होंने बग़दाद विश्वविधालय से बी.ए. की डिग्री प्राप्त की। सद्दाम हुसैन के शत्रुओं की सूची में आने से पहले उन्होंने बग़दाद ऑब्ज़र्वर के लिए अनुवादक और पत्रकार के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। इसके बाद नब्बे के दशक के मध्य में वह अमेरिका चली गईं जहाँ उन्होंने वेयन स्टेट यूनिवर्सिटी से एम.ए. की डिग्री प्राप्त की।

मूल कविता: ‘मैं जल्दी में थी’ (I Was In A Hurry)
कवयित्री: दुन्या मिखाइल (Dunya Mikhail)

हिन्दी अनुवाद: योगेश ध्यानी

मैं जल्दी में थी

एलिज़ाबेथ विंस्लो के अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित

कल मैंने एक देश खो दिया
मैं जल्दी में थी
मुझे नहीं पता कब छूटा वह मुझसे
एक वृक्ष से टूटी शाख की तरह।
कृपया यदि कोई गुज़रे और टकराए उससे
शायद एक सूटकेस में
आकाश की ओर खुला
या किसी चट्टान पर
गहरे घाव-सा अंकित
या अप्रवासियों के कम्बलों में लिपटा
या हारे हुए लाॅटरी के टिकट-सा निरस्त
या यातना में भुला दिया गया असहाय
या शिशुओं के प्रश्नों-सा आगे बढ़ता निरुद्देश्य
या उठता हुआ युद्ध के ग़ुबार के साथ
या रेत पर एक हेल्मेट में लोटता
या चोरी जा चुका अली बाबा के ज़ार से
या उस पुलिस की वर्दी में बदलकर भेष
जो बन्दियों को छेड़कर भाग गया
या उस स्त्री के मस्तिष्क में बैठा
जो मुस्कुराने के प्रयास में है
या बिखरा हुआ
अमेरिका के नये अप्रवासियों के सपनों की तरह।
यदि किसी को भी मिले
कृपया लौटा दे मुझे
कृपया लौटा दें, सर
कृपया लौटा दें, मैडम
यह मेरा देश है…
मैं जल्दी में थी
जब मैंने इसे खो दिया था कल।

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