मुझे मेरी परछाई से शिकायत है, वह मेरी ठीक-ठीक आकृति नहीं बनाती। वह कभी मेरे कद से छोटा तो कभी मेरे कद से बड़ा तो कभी-कभी मेरे दोनों पैरों के इर्द गिर्द एक गोला घेरा बना लिया करती है। मैं उससे छुपने के लिये पेड़ों की ओट में चला जाता हूँ तो कभी दीवारों का सहारा लेता हूँ। नजर घुमा कर देखता हूँ वो मेरे सहारे को मुझसे जोड़ कर एक नई आकृति गढ़ रही होती है। मैं भागता हूँ, बेतहाशा, उससे कोसो दूर निकल जाना चाहता हूँ, पर उसकी जिद मेरे पैरों में लिपटी हुई मिलती है। मैंने उससे कई बार कहा, ठीक-ठीक हिसाब क्यूँ नहीं लगा लेती, तुम मुझे ठीक वैसा ही क्यूँ नहीं पेश करती, जैसा मैं हूँ। वो कुछ नहीं बोली, कभी नहीं बोली, चुप चाप मेरी आकृतियां बनाती रही।

मैं एक दिन गुस्से से घर से नहीं निकला। मैं खुश था कि आज परछाई से मुलाकात नहीं होगी। तभी खिड़की से झांकती रौशनी का एक टुकड़ा मेरे शरीर से आ लगा। पलट कर देखा तो परछाई थी, दीवार पर एक आकृति लिये हुये। मैं उसके करीब जाने लगा, और करीब, जितना करीब गया वो गायब होने लगी। मेरे अंदर एक अजीब सी टीस उठी, उसके खो जाने की। मैं समझ नहीं पा रहा था, जिससे मैं इतने दिनों से भागता रहा, उसके दूर जाने पर मुझे खुश होना चाहिये, पर ऐसा नहीं था। मेरे चेहरे पर दुःख की रेखायें उभर आईं। मुझे लगने लगा, मैंने किसी को खो दिया। “क्या मैं उससे प्यार करने लगा था?” जैसे ख्याल अपनी जगह बनाने लगे थे। मैं गुणा भाग नहीं करना चाहता था, मुझे महसूस हुआ, उसका जिद्दीपन मुझे अच्छा लगने लगा था, और मेरा भागना, खुद से भागना था। मैं फूट-फूट कर रोने लगा… बिल्कुल एक बच्चे की तरह…

मैं अक्सर बच्चे की तरह रोना चाहता हूँ.. मैं अपने अंदर किसी बोझ को स्थान नहीं देना चाहता। मैं बिलकुल खाली हो जाना चाहता था, उस रोज…

***

मैं ध्वनि परावर्तन के विज्ञान को जानता हूँ, फिर भी मैं खाली कुएँ में झांक कर बार-बार अपना नाम पुकारता हूँ, और कुएँ से लौटती खुद की आवाज को सुनकर खुश होता हूँ। मुझे लगता हैं कोई है जिसने मेरा अभी-अभी नाम लिया और वो मुझसे बेहतर संजीदा व्यक्ति है। एक खाली कुआँ मेरे मन में भी है, जिसके अवचेतन की गहराई में उस जैसा कोई इंसान जमा बैठा है, और जहाँ मैं खुद को उसकी तरह दिखना पसंद करता हूँ… और हर सुबह उठते ही एक तैयारी में लग जाता हूँ। किसी शांत जमे पानी के किनारे कुछ देर बैठते ही, मैं पास पड़े एक पत्थर को उठा फेंकता हूँ उस पानी में.. पत्थर के पानी को छूते ही वर्तुल घेरे किनारे को छूने भाँगने लगते हैं, और मुझे सुकून मिलता हैं कि मैं जिंदा हूँ! दिलो दिमाग की हलचल लेखन की अनिवार्य शर्त है, और किसी दिन कुछ भी ना लिख पाने का डर, मुझे ज्यादा देर किसी शांत, ठहरे तालाब को देखने से रोकता है। मैं क्यों लिखता हूँ का जबाब बस इतना है – कि मैं बेहद डरा हुआ इंसान हूँ इसलिये लिखता हूँ, और लिखकर हर दिन बेहतर इंसान होना चाहता हूँ ठीक उसकी तरह जो मेरे गहरे अवचेतन में बैठा है…. इसलिये जब आप मुझसे मिलेंगे तब आप मुझसे नहीं भी मिलेंगे… इसलिये…

मैं अपनी मुलाकात के कुछ नियम बनाना चाहता हूँ
जो भी मिले मुझसे
वो तीन बार ज़रूर मिले

पहली मुलाकात में हम दोनों एक-दूसरे को निहारें
पढ़ लें एक-दूसरे को पूरा का पूरा

दूसरी मुलाकात में सिर्फ एक-दूसरे को सुनें
महसूस कर लें दिमाग और आत्मा के बीच की खाई

और तीसरी मुलाकात में हम दोनों एक-दूसरे का झूठ सामने रख दें
बिना किसी तैयारी के
जिसे छुपाये रखने का हर सम्भव प्रयास हमने किया था।

चौथी मुलाकात की सम्भावना
दूसरी मुलाकात में हम भाँप सकते हैं
और तीसरी मुलाकात को रद्द कर हम
बार-बार पहली मुलाकात कर सकते हैं और नियमानुसार चौथी बार मिलना मुझे पसंद नहीं।

***

वो कमरे की बायीं दीवार को घण्टों देखती है, और दायीं ओर करवट कर के सो जाती है। मैं देखता हूँ, कुछ बूंद तकिये को भीगो रही होती हैं। वो जिद्दी है.. मेरे कई बार पूछने पर भी वो ‘कुछ नहीं’ कह कर टाल देने की कोशिश करती है।

वह एक रोज काम से जल्दी लौटी और उस दीवार को नीले रंग से रँगने लगी, उसे आसमान का यह रँग पसन्द था। दीवार को रँगते-रँगते, एक छोटी बच्ची की तरह उसने अपने चेहरे पर आसमानी रँग के छीटें बिखेर लिये थे। दीवार आसमानी हो चुकी थी, पर थोड़ी देर बाद उसे निहारते-निहारते, वो अचानक उदास होकर बैठ गयी। “कुछ कमी है” का चित्र उसके चेहरे पर उभरने लगा। वो उस रात फिर नहीं सोई, और पूरी रात करवटें लेती रही। आज बेचैनी इस बात की थी की वो उस कमी को ढूंढ क्यों नहीं पा रही जो उसके आसपास ही है और यह जानते हुए भी वो बार-बार उससे हार रही है। मैं चुपचाप उसके बगल में लेटा उसे देखता रहा।

अगले दिन काम से जब घर लौटा तो देखा, वो कमरे में मौजूद थी, और उस दीवार पर काले रंग से एक उड़ती चिड़िया की तस्वीर बना रही थी, जिसके बगल में एक अधखुला पिंजड़ा पड़ा था। मैंने स्केच लिया और बड़े अक्षर में लिख दिया- ‘USE YOUR WINGS.’ हम दोनों दीवार को कुछ दूर निहारने लगे। उसने मुस्कराते हुये मेरे सीने पर अपना सिर टिका दिया। उस रोज वह बायीं ओर करवट कर सुकून से सोती रही। उसका चेहरा एक अभी जन्म लिये हुये बच्चे की तरह लग रहा था, बिल्कुल शांत और निश्छल।

वह अब हर रोज उस बायीं दीवार को पोस्टर से घण्टों सजाती है, और खुश होती है। उसने अब दीवारों पर कविताएँ लिखनी शुरू कर दी हैं। वो हर रात सोने से पहले उन कविताओं को सुनाती है… वो कहती है.. इन्हें मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखती फिर भी तुम्हें सुनाते वक़्त ये कैसे तुम्हारी हो जाती हैं? तुम कोई जादू तो नहीं करते…

***

कदम आगे बढ़ते जाते हैं, और मन स्मृति में पीछे लौटता है। कई बार मेरा मन मेरे पैर से पहले थक जाता है और मैं वर्तमान में आ गिरता हूँ..

अनजान सड़क मेरे पैरों को नहीं पहचानती है, और मेरे पैर इन सड़कों को नहीं.. ‘अनजान’ शब्द बेहद प्यारा है, बिल्कुल रुई के फाहे की तरह हल्का। कुछ शब्द बेहद प्यारे होते हैं, मन करता है उन शब्दों को बुदबुदाता रहूँ… उनसे खेलूं… और उन्हें अपने सिरहाने रखूँ… मैं उन सड़कों पर धीमे-धीमे चलना चाहता हूँ, खामोशी के साथ। मेरा मन, कान लगाकर आसपास की आवाज़ें सुनना चाहता है। जो मुझसे नहीं कहा गया है। मैं कुछ अनजान भाषाएँ सीखना चाहता हूँ। पेड़ पर बैठी उस छोटी चिड़िया की जिसने मुझे अभी-अभी उत्सुकता से देखा। दीवार पर चलती कतारबद्ध चींटियों की, जो बरसात से पहले अपने भोजन को इकठ्टा करने में लगी हैं। मैं सोचता हूँ इनकी भाषाएँ क्या होंगी? क्या कोई टेढ़े मेढ़े शब्द? मन मुस्करा देता है… क्योंकि मैंने देखा कि वो वहाँ से उठ के बगल के पेड़ पर चली गयी और मेरे अगले पेड़ तक पहुँचने से पहले, वो फिर उड़ के दूसरे पेड़ पर चली जाती हैं.. वो क्या ढूँढ रही है? मैं उससे पूछना चाहता हूँ… मेरा मन भी उसी छोटी चिड़िया की तरह है। सड़क कभी खत्म नहीं होती, और मैं धीरे-धीरे इस पर चलता रहूँगा। आप मेरे लिखे में क्या ढूँढ रहे हैं? कोई मतलब? तो आप निराश हो सकते हैं! मैं किसी भी रास्ते मुड़ सकता हूँ, लिखने में भी.. और किसी सड़क पर चलने में भी… यूँ ही… बेवजह…

***

मुझे तुमसे प्यार करने में, और तुम्हारा मुझसे प्यार चाहने में इतनी भर जगह खाली रही जहाँ एक पतली सख्त दीवार उग आ सकती थी और ठीक वैसा ही हुआ, जिसे गिरा पाने में मैं असमर्थ रहा। संशयग्रस्त मन किसी पिलर की तरह दीवार को सहारा दे रहा था, और हठी चुप्पी छप्पर बन एक घर  तैयार कर रही थी, जहाँ तुम खुद को सुरक्षित महसूस करने लगी थीं। हम दोनों के हिस्से कुछ ना कुछ आना था- जब ठहरे वर्तमान को मुट्ठी में पकड़ता हूँ, निर्मम अकेलापन और कई अनमने क्षण रेत की तरह फिसलते नजर आते हैं, ये मेरे हिस्से आयी चीज़ें थीं। चूंकि हमने विपरीत दिशाओं में लम्बी दूरी तय कर ली है तो तुम्हारे हिस्से क्या आया, ये मैं कभी नहीं जान पाऊंगा पर तुम जानती होगी मेरे हिस्से की कहानी.. क्योंकि तुम मेरे मौन को पढ़ लिया करती थीं। तुम मेरी बन्द मुट्ठी का सही-सही अनुमान लगा लेती थीं कि मैंने किस मुट्ठी में तुम्हारे नाम की पर्ची छुपाई है, और इस खेल में हारता हुआ मैं खुश हुआ करता था।

कभी कभी हारना, जीतने से ज्यादा सुखद होता है। जीतने के बाद कोशिश खत्म हो जाती है, इसलिये दार्शनिकों ने ‘प्रेम में हारना’ शब्द ईजाद किया ताकि प्रेम करते रहने की कोशिश चींटियों की तरह किसी दीवार पर चढ़ते रहने की तरह होती रहे…

***

“तुम कहाँ मिलोगे?” उसने मेरे कँधे पर सिर रखते हुये पूछा।

“अपनी कविताओं में लिखे किन्ही दो शब्दों के अंतराल में”, मैंने कहा।

“और मैं उंगलियों से छू कर उस अंतराल को महसूस करूँगी..” वो एक गहरी साँस लेते हुये बोली और अपनी उंगलियों से मेरी तलहथी पर ‘कुछ’ लिखने लगी।

अक्सर ऐसे समय में एक गहन चुप्पी हमारे बीच आकर बैठ जाया करती थी। घंटों की इस चुप्पी के साथ हम दोनों सूरज को डूबता देखने लगे। आसमान धीरे-धीरे रंग बदल रहा था, उसकी आँख से एक नदी फूट पड़ी थी… यह अंतिम संवाद था, हमारे बीच!

***

मैं खाली डिब्बे में क्या तलाशता हूँ.. अपना सुख.. नहीं, अपना दुःख… कितना अजीब है ना जब हम किसी चीज को जी रहे होते हैं तो उसके होने का ठीक-ठीक एहसास कभी नहीं होता और वो बीत जाता है। पर दुःख के साथ ऐसा नहीं है। वो समानांतर चलता है इसलिये हमारी आँखें ठीक-ठीक महसूस कर रही होती हैं।

मुझे उसका चेहरा ठीक-ठीक याद नहीं। वो जब भी साथ होती थी, मैंने उसे कभी ठीक से नहीं देखा। जैसे आप अपने कमरे में सालों से रहते हैं पर आपने कभी गौर से उसके हर एक कोने को नहीं देखा। आप हर रात जिस बिस्तर पर सोते हैं, उसको ठीक-ठीक छू कर महसूस नहीं किया। आपने चादर के हर उलझे रेशों पर कभी गौर नहीं किया। आपने फर्श की ठंडक को कभी महसूस नहीं किया। चाय की हर घूंट कब हलक से उतर गई हमें एहसास तक नहीं हुआ। हम अपनी ज़िन्दगी में जीये गये हिस्सो में अधिकांश समय यंत्रवत होते हैं। हमने कभी रुक कर, ठहर कर कभी देखने की कोशिश नहीं की.. हम क्या जी रहे हैं? हम किसे जी रहे हैं?

आँखे बंद कर के मुझे उसका कोई चेहरा याद नहीं आ पाता, कितना अजीब है ना वो मेरी प्रेमिका थी। हम कितनी सड़कों पर साथ-साथ चले, कितनी बार सूरज को साथ-साथ डूबते देखा, बारिश की बूंदों में ना जाने कितनी बार साथ-साथ भीगे… ये ‘साथ-साथ’ एक रहस्यमयी शब्द है जिसका ठीक-ठीक कोई स्केल नहीं। क्या हम अपने-अपने हिस्से की ज़िन्दगी जी रहे थे? नहीं नहीं, मैं उस पर संदेह नहीं कर रहा। उसे पता है मेरे सिर के बाएं तरफ कटे का निशान है। बचपन मे खेलते वक़्त किसी ने लकड़ी के छोटे टुकड़े से घाव कर दिया था, माँ बहुत रोई थी। मुझे गोद में लेकर सड़को पर भाग रही थी। पिता जी शहर से बाहर थे। मैं बेहोश नहीं था, पर मैं होश में भी नहीं था। यह ठीक ऐसी अवस्था है जब हमें ठीक-ठीक प्रतिक्रिया देना नहीं आता। क्या मैंने अपने को उसके सामने ठीक-ठीक रख दिया था? क्या उसने भी सारी कहानियाँ मुझे सुनाई होंगी? जब हम साथ थे, हमने ढेरों बातें की थी। इन बातों के ढेर में मैं कुछ टटोल रहा हूँ.. दुःख या सुख.. ठीक-ठीक पता नहीं…

***

PS: ना कहानी, ना कविता… इस लिखे में तुम हो, तुम्हारा शहर है, हमारे बीच बैठी कभी-कभी की चुप्पी है.. चाय की हल्की गर्माहट भी है जिसके घूंट के साथ हम एक-दूसरे की शिकायतें गटक जाते थे। यह अकेलेपन में शब्दों की तलाश है…

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गौरव गुप्ता
हिन्दी युवा कवि. सम्पर्क- [email protected]

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