इन्तज़ार और

‘Intezaar Aur’, a poem by Janakraj Pareek

सुमेश बाबू
देर तक
उसकी लुज-लुज छातियों से जूझते रहे
पर उरमला को
उसी तरह ठण्डा और ठस्स पाकर
झुँझलाए
और कमला बाई के पास जाकर चिल्लाए-
क्या बेकार माल भेजा है
अधेल की चीज़ नहीं है।
कम्बख़्त को
हिलने डुलने की तमीज़ नहीं है।
उसने बताया है-
उसके एक बच्चा भी है।

उरमला तिलमिलायी-
साहब
वह बच्चा ही है
जो मुझे आप तक ले आया है,
वर्ना पेशे का पैसा
शौक़ से किसने खाया है?

कमला बाई ने
उरमला को डाँटा
और सुमेश बाबू से बोली-
बुरा मत मानना, साहब।
बच्ची है
बच्चे में उलझी रहती है।
बच्चा बीमार है
आजकल में जाएगा
तभी इसका जी जगह पर आएगा।
फ़ुरसत में थोड़ा धँधा समझ लेगी
तो यक़ीन करना, हुज़ूर
दो में सौ का काम देगी।

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