एक ज़माना गुज़र गया
जाते-जाते कह गया
चाँदी उतर आई है बालों पर
थक गई होगी,
बुन क्यों नहीं लेती ख्यालों की चारपाई?
सुस्ता ले ज़रा
ख्वाबों की चादर ओढ़
कुनकुनी धूप में।
शाम ढले जब लौटें पंछी
सुकून से मन की मिठास
चाय में मिला पिला देना
रात को सितारों की छाँव तले
बातें करना चाँद से
फिर –
एक और सुबह
एक और दोपहर
एक और शाम और रात का
इंतज़ार यूँ ही।
ख़त्म हो जाती है दिनचर्या
मैं वहीं खड़ी रह जाती हूँ
फिर एक ज़माना गुज़रने को है…

* * *

अमनदीप / विम्मी

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