मैंने अपने बारे में बहुत कुछ नहीं सुना
जो कुछ सुना उसकी परवाह नहीं की
मैंने अपने मैं को कभी नहीं किया परिभाषित
मैंने ख़ुद को
काले और सफ़ेद दोनों ख़ानों में
एक सा असहज पाया
मैंने कुछ पुण्य के लिए नहीं दिया
मैंने कुछ भी मजबूरी में नहीं चाहा
मैंने हर बार पानी को पानी कहा
और भाप को भाप
मैंने वरीयता के क्रम में
ख़ुद को कहीं नहीं रखा
मैंने अनेक आँसुओं को पी लिया
और अनेक आँसुओं को रोकने का प्रयास किया
मैंने हाँ और न कहने में देर नहीं लगायी
मैंने मन पर कोई ताला नहीं डाला
मैंने जब-जब नदी को छुआ
केवल शीतलता का आचमन किया
मैंने जब चाहा सपने में तुम मिलो
सोने से पहले तुमसे ले ली आज्ञा
मैंने जब कुछ रंगों में तुम्हें देखा
सबसे पहले तुम्हें बताया
मैंने कई आलिंगन अधूरे छोड़े
कई शिकायतें सुनी होंठो की
मैंने धड़कनों का विरोध झेला
मैंने कितने ही बार
पूरा दिन दोबारा सजा दिया
तुम्हारे लिए एक जगह खोजते हुए

इस कविता में बहुत मैं है
इसे पूरा नहीं किया जाना चाहिए..

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