ये जिन्दगी की जंग हार के चले हैं हम
इस जिन्दगी को उसने संवरने नहींं दिया

तिनके की क्या औकात आंधियों के सामने
उड़ते बवंड़रो ने सम्भलने नहींं दिया

अहसास करके घायल छिड़का नमक दगा का
उस बेवफा ने चैन से मरने नहींं दिया

मुझे खाक में मिलाया और मिट्टी डाल दी
कुछ दुश्मनो को जश्न तक करने नहींं दिया

वो कब्र पे भी आया नम झूठी आँख लेकर
मरने के बाद भी जख्म भरने नहींं दिया

मेरी गीली कब्र चूम के बोला वो गर्व से
तुझको मिटा दिया है पर लड़ने नहींं दिया