ईश्वर अगर मैंने अरबी में
प्रार्थना की, तू मुझसे
नाराज़ हो जाएगा?
अल्लमह यदि मैंने संस्कृत में
संध्या कर ली तो तू
मुझे दोज़ख़ में डालेगा?
लोग तो यही कहते घूम रहे हैं।
तू बता, ईश्वर!
तू ही समझा, मेरे अल्लाह!

बहुत-सी प्रार्थनाएँ हैं
मुझे बहुत-बहुत
मोहती हैं।
ऐसा क्यों नहीं है कि
एक ही प्रार्थना मैं
दिल से क़ुबूल कर लूँ
और अन्य प्रार्थनाओं को
करने पर प्रायश्चित
करने का संकल्प करूँ!
क्योंकि तब मैं अधिक
धार्मिक अपने को महसूस
करूँगा, इसमें कोई संदेह
नहीं है।
सब यही कहते हैं
(मुझसे नहीं… उससे
भी अधिक उच्च घोषणा में
जो कि उनके कर्मों में
प्रसारित होती है।)
मैं चाहता हूँ उनके प्रचार
प्रसार से अभिभूत होना
क्योंकि अन्यथा मैं अपने को
अति ही, अति ही
अति ही प्राचीन और
दक़ियानूसी महसूस करता
हूँ, मानो मैं धर्म
और ईश्वर का
प्रारम्भिक अर्थ नहीं
जानता।

हे मेरे ईश्वर, हे मेरे
अल्ला, मुझे
क्षमा करना! अफ़्व!
अफ़्व!

तुम दोनों ही मिलकर
मेरा अंत कर दो
बेहतर है। वह
शान्ति जो आज
न होने में है—
“न होता मैं तो क्या होता…!
न था मैं तो ख़ुदा था
कुछ न होता तो ख़ुदा होता!
डुबोया मुझको होने ने
न होता मैं तो क्या होता!”

आज वो नहीं है जो सुना
और कण्ठस्थ किया जाता है!
छपे काव्य में। लिपि सम्बन्धी
दंगे
संस्कृति
बनने लगते हैं
जिसका शोध मेरे लिए दुरूहतम
साहित्य है
जन्म भर की आस्था के
बावजूद।

यह कविता नहीं मात्र
मेरी डायरी है
(अपनी मौलिक स्थिति में
छपाने की चीज़ नहीं
अपने से बातचीत है मात्र…
अपने मन के होंठों के स्वर
मन के कानों के लिए
अपने केवल मात्र…)

मनीषियो आलिमो
आचार्यो प्राचार्यो
अपना गहन अमूल्य समय
इन पंक्तियों को न देना यदि भूले से
इन्हें पढ़ने लगे हो
यहीं से इन्हें छोड़ देना।

…तो मैं कह रहा था।

Book by Shamsher Bahadur Singh:

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शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर बहादुर सिंह 13 जनवरी 1911- 12 मई 1993 आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ हैं। हिंदी कविता में अनूठे माँसल एंद्रीए बिंबों के रचयिता शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे। तार सप्तक से शुरुआत कर चुका भी नहीं हूँ मैं के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया।