ईश्वर से अनुबन्ध है प्रेम का

जब समंदर की
हरहराती लहरें सब लील
लेने को आतुर हो उठती हैं
नदियाँ नष्ट कर डालती हैं
अपनी गोद में पलती और जवान होती
सभ्यताओं को भी
जंगलों के पेड़ भी जब
आपस में रगड़ खा कर
जल उठते हैं
इंसानों की भाँति
तब
न जाने किस अनुबन्ध के तहत
ईर्ष्या और कुंठा में जलकर
समाप्त होते विश्व में
आँखों में पानी
और होठों पर मुस्कुराहट की
ऊर्जा लिए
ईश्वर ने प्रेम को आजन्म अमरता का
वर दे दिया!